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‘धुंध’ : हरि प्रकाश दुबे

‘धुंध’ : हरि प्रकाश दुबे

 

“अरे आइये – आइये अवस्थी जी, आज इतनी सर्द शाम को आप मेरे घर, वाह! अरे रुकिए पहले पीने के लिए कुछ लेकर आता हूँ, ये लीजिये ब्रांडी है, ठीक रहेगी । पर यह क्या, इतना पसीना क्यों आ रहा है आपको?”

“अरे कुछ ख़ास नहीं, बस थोडा सा घबरा गया था।“

ओह !..“ अवस्थी जी अब पहेलियाँ मत बुझाइये, ठीक –ठीक बताइये की हुआ क्या ?”    

“क्या बताऊं चौधरी साहब ! आज अभी कुछ देर पहले, कुछ बाइक सवार लोगों ने मुझे रास्ते में घेर लिया, जबरन गाड़ी का शीशा खुलवाया और कनपटी पर रिवाल्वर लगा कर मेरा फ़ोन , घड़ी, पर्स सब छीन लिया, वो तो मेरी गाड़ी भी ले जाने की फिराक में थे पर तभी उनमें से किसी ने कहा की बस !.. बस यूँ समझिये जान बच गयी आज, देखिये, दिल अभी भी तेजी से धड़क रहा है, बड़ी मुश्किल से आपके घर तक पहुंचा हूँ, अब घर तक जाने की हिम्मत भी नहीं हो रही है ।”

“कोई बात नहीं अवस्थी जी, चलिये मैं पंहुचा देता हूँ, या पहले थाने चलते हैं फिर आपको घर तक छोड़कर मैं वापस आ जाऊंगा ।“

“हा ..हा यह भी खूब कहा आपने चौधरी साहब अब रात भर यही खेल चलेगा क्या ? वैसे अपना बेटा आनंद कहाँ है ?”

“ये लीजिये अवस्थी जी, आपने नाम लिया और साहब हाजिर, आनंद साहब अब कमाने लगे हैं , एक बड़ी कम्पनी में सुरक्षा अधिकारी हैं, अरे आनंद जरा अवस्थी अंकल को घर तक छोड़ कर आ जाओ ।“...जी पिताजी ।“

“प्रणाम अवस्थी अंकल, चलिए ।“

“खुश रहो बेटा, पर तुम कैसे आओगे ?“

“अरे अंकल मेरा एक गार्ड मोटरसाइकिल लिए बाहर ही खड़ा है, मैं जरा राउंड पर हूँ ,बस आपको छोड़कर मैं उसी के साथ आ जाऊंगा , आप बिलकुल चिंता न करें, अब आनंद अवस्थी जी की कार को लेकर उनके घर की तरफ चल दिया, और थोड़ी ही दूर पर उसने कार रोक दी और अवस्थी जी से कहा, अंकल बाहर ‘धुंध’ बहुत है कुछ भी ठीक से नहीं दिखाई दे रहा, जरा मैं शीशा साफ़ करता हूँ, गाड़ी का हीटर ऑन है आप अन्दर ही बैठिये ।“

तभी पीछे से मोटरसाइकिल लिए गार्ड भी बगल में रूक गया और आनंद से बोला क्या बात है बॉस ? अबे जल्दी से सारा सामान वापस कर –आनंद ने कहा !

“लीजिये अंकल अब सब साफ़ दिखाई दे रहा है, और ये लीजिये अपना फ़ोन, घड़ी और पर्स और हाँ इतनी रात को इस उम्र में अकेले मत निकला करिए वो भी इतनी सर्दी और ‘धुंध’ में, वो तो अच्छा हुआ मैंने आपको पहचान लिया था वरना ! आप तो जानते ही हैं, ज़माना कितना खराब है , ये लीजिये आपका घर भी आ गया, अब चलता हूँ, और हाँ पिताजी और पुलिस के चक्कर में मत पड़ियेगा ।“

“अरे बेटा चाय तो पीकर जाओ ।“

“शुक्रिया अंकल ,फिर कभी, आज ‘धुंध’ बहुत है, धन्धे का समय है ।”

 

© हरि प्रकाश दुबे

"मौलिक व अप्रकाशित"

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 10, 2016 at 12:25am

अजीब ही धंधा है ! :-)))

बहरहाल, इस प्रस्तुति केलिए हार्दिक शुभकामनाएँ. 

Comment by vijay nikore on February 2, 2016 at 3:43pm

//आज ‘धुंध’ बहुत है, धन्धे का समय है//..... इन शब्दों में लघु-कथा की जान है। हार्दिक बधाई।

Comment by Hari Prakash Dubey on February 2, 2016 at 2:37am

बहुत -बहुत आभार आपका आ.तेज वीर सिंह जी ! सादर 

Comment by Hari Prakash Dubey on February 2, 2016 at 2:34am

रचना पर आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया हेतु  सादर धन्यवाद आदरणीय Samar kabeer साहब !सादर 

Comment by VIRENDER VEER MEHTA on January 28, 2016 at 10:15pm
बहुत उम्दा रचना आदरणीय हरी प्रकाश दुबे जी। धुंध और कोहरे को विभिन्न जगह पर विभिन्न प्रयोगों के साथ जो रचना को आपने बेहतर लुक दिया है उसने रचना को और अधिक प्रभावी बना दिया है। सादर बधाई स्वीकार करे। सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 28, 2016 at 12:15am

आदरणीय हरि प्रकाश जी, बहुत बढ़िया लघुकथा हुई है. हार्दिक बधाई.

Comment by kanta roy on January 27, 2016 at 9:19am

रोजगार के तलाश में बहकते कदम , एक गहन विडम्बना को उकेरा है आपने इस धुंध के माध्यम से।  ढेरों बधाई स्वीकार करे आदरणीय हरी प्रकाश जी। 

Comment by pratibha pande on January 26, 2016 at 7:33pm
आज ‘धुंध’ बहुत है, धन्धे का समय है ।” इस अंतिम वाक्य ने इतना कुछ कह दिया कि कई धुध में छिपे चेहरे साफ़ दिखने लगे , इस शानदार प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय हरि प्रकाश दुबे जी
Comment by TEJ VEER SINGH on January 26, 2016 at 6:58pm

हार्दिक बधाई आदरणीय हरि प्रकाश दुबे जी!बहुत शानदार लघुकथा!समाज कितनी तरक्की कर गया है!लोग पढ लिख कर भी लूट खसोट कर रहे हैं!लाज़वाब प्रस्तुति!

Comment by Samar kabeer on January 26, 2016 at 5:36pm
जनाब हरि प्रकाश दूबे जी आदाब,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें !

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