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बात आई गयी [लघु कथा ] प्रदीप कुमार पांडे

अपने बंगले के बगीचे की दीवार के पास जमा भीड़ देखकर उसने गाड़ी रोक दी I

" क्या हुआ "? बाहर निकल उसने पूछा I

"कोई भिखारी मर गया "I

" कैसे ?"

" कैसे क्या साहब ,ठण्ड से अकड़ कर I पिछले कुछ दिनों से  यहीं पड़ा रहता था दीवार के पास I"

गाड़ी  में  बैठते उसे लगा ,उसका सारा शरीर ठण्ड से जमा जा रहा है I चार दिन पहले पत्नी ने कहा था कि पुराने गर्म कपडे कम्बल  काफी जमा हो गए हैं , कहीं दान करने चलना है I और फिर बात आई गयी हो गयी थी I

" अरे, अब क्या चद्दर डाल रहे हो इसके ऊपर , चलो चलो  हटो i ले जाने दो " I शव वाहन वाले काम में लग गए थे I

 मौलिक व् अप्रकाशित 

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 5, 2016 at 10:40pm

आडम्बरों में जकड़ी यह दुनिया अपने ही भविष्य के प्रति कितनी लापरवाह होती है न ? एक सशक्त लघुकथा के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय प्रदीप जी.

शुभकामनाएँ

Comment by Pawan Jain on February 5, 2016 at 12:27pm

आदरणीय प्रदीप कुमार पांडे जी,बहुत बहुत बधाई,हम सोचते ही रह जाते हैं।

Comment by TEJ VEER SINGH on February 5, 2016 at 10:26am

हार्दिक बधाई आदरणीय राहिला जी!बेहतरीन प्रस्तुति!

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on February 4, 2016 at 5:30pm
सुंदर सन्देश।अब चद्दर का क्या?
बहुत बहुत बधाई आदरणीय प्रदीप जी।
Comment by नादिर ख़ान on February 4, 2016 at 11:28am

अरे, अब क्या चद्दर डाल रहे हो इसके ऊपर............

आदरणीय प्रदीप पाण्डेय जी सुन्दर प्रस्तुति के लिए बधाई....

सही कहा आपने जो कुछ करना  है जीते जी ही करना है समय निकल जाने के बाद सब कुछ व्यर्थ है,फिर तो आत्मग्लानि के सिवाय  कुछ नहीं बचता ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 4, 2016 at 12:46am

आदरणीय प्रदीप जी, बहुत ही सार्थक लघुकथा लिखी है आपने. रचना का सन्देश बहुत तीव्रता से प्रभवित करता है इस प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई. सादर 

Comment by Rahila on February 3, 2016 at 6:29pm
बहुत बधाई आदरणीय प्रदीप सर जी!वाकई लोगों का सोचने में ही समय निकल जाता है ।दिल को छू लेने वाली एक सार्थक लघुकथा के लिये पुनः बधाई । सादर प्रणाम ।

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