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राजनीति के खेल में, दाँव लग गया देश।
घूम रहे गद्दार भी, धर नेता का वेष।।

बच कर रहिये दोस्तों, करिये सोच विचार।
उकसावे में अन्य के, न करिये व्यवहार।।

चञ्चल मन को रोकिये, हिंसा तो है पाप।
संविधान की बात को, प्रथम मानिये आप।।

यहाँ वहां मत फेंकिये, कूड़ा कचरा यार।
आएगा उड़ कर वही, पुनः आपके द्वार।।

पंकज का तो नीर से, जीवन का सम्बन्ध।
जिसकी आँख में है नहीं, कैसे हो अनुबंध।।


मौलिक एवम् अप्रकाशित

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on February 24, 2016 at 9:31am
आदरणीय कांता रॉय मैम सादर आभार।
Comment by kanta roy on February 23, 2016 at 10:31pm
दैनिक जीवन में सदाचार की सीख देती हुई आपकी समस्त दोहे सार्थक सार को अपने में समाहित किये हुए है । बहुत बहुत बधाई आपको आदरणीय पंकज जी ।
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on February 23, 2016 at 2:22pm
आदरणीय राहिला जी तारीफों से आगे और बेहतर करने के लिए बल मिलता है, सादर धन्यवाद
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on February 23, 2016 at 2:21pm
आदरणीय लक्ष्मण सर सादर धन्यवाद, प्रोत्साहन के ये शब्द अच्छे लगते हैं
Comment by Rahila on February 23, 2016 at 11:47am
बहुत अच्छेे लगे सभी दोहे, शानदार प्रस्तुति आदरणीय सर जी । सादर
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 23, 2016 at 11:36am

बहुत सुन्दर हार्दिक बधाई

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