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"कल आपका बेटा परीक्षा में नकल करते हुए पकड़ा गया है, यह आखिरी चेतावनी है, अब भी नहीं सुधरा तो स्कूल से निकाल देंगे|" सवेरे-सवेरे विद्यालय में बुलाकर प्राचार्य द्वारा कहे गए शब्द उसके मस्तिष्क में हथौड़े की तरह बज रहे थे| वो क्रोध से लाल हो रहा था, और उसके हाथ स्वतः ही मोटरसाइकिल की गति बढा रहे थे|

"मेरी मेहनत का यह सिला दिया उसने, कितना कहता हूँ कि पढ़ ले, लेकिन वो है कि.... आज तो पराकाष्ठा हो गयी है, रोज़ तो उसे केवल थप्पड़ ही पड़ते हैं, लेकिन आज जूते ही....|" यही सोचते हुए वो घर पहुँच गया| तीव्र गति से चलती मोटरसाइकिल ब्रेक लगते ही गिरते-गिरते बची, जिसने उसका क्रोध और बढ़ा दिया|

दरवाज़े के बाहर समाचार-पत्र रखा हुआ था, उसे उठा कर वो बुदबुदाया, "किसी को इसकी भी परवाह नहीं है..."

अंदर जाते ही वो अख़बार को सोफे पर पटक कर चिल्लाया, "अपने प्यारे बेटे को अभी बुलाओ...."

उसकी पत्नी और बेटा लगभग दौड़ कर अंदर के कमरे से आये, तब तक उसने जूता अपने हाथ में उठा लिया था|

"इधर आओ..!" उसने बेटे को बुलाया|

बेटा घबरा गया, उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया और कांपते हुए सोफे के पीछे की तरफ चला गया|

वो गुस्से में चिल्लाया, "क्या बातें सीख कर आया है? एक तो पढता नहीं है और उस पर नकल...." वो बेटे पर लपका, बेटे ने सोफे पर रखे समाचारपत्र से अपना मुंह ढक लिया|

अचानक क्रोध में तमतमाता चेहरा फक पड़ गया, आँखें फ़ैल से गयीं और उसके हाथ से जूता फिसल गया|

अख़बार में एक समाचार था - 'फेल होने पर भय से एक छात्र द्वारा आत्महत्या'

उसने एक झटके से अख़बार अपने बेटे के चेहरे से हटा कर उसके चेहरे को अपने हाथों में लिया|

(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on March 15, 2016 at 4:57pm

रचना को पसंद करने और मेरा उत्साहवर्धन करने के लिए सादर आभार आदरणीय तेजवीर सिंह जी सर, आदरणीय डॉ विजय शंकर जी सर, आदरणीय अमित त्रिपाठी जी, आदरणीया राहिला जी |

Comment by Rahila on March 7, 2016 at 1:53pm
रचना बहुत ही सार्थक है ।आज के समय के हिसाब से बहुत ही सटीक ।बहुत बधाई आपको आदरणीय सर जी
Comment by Amit Tripathi Azaad on March 7, 2016 at 12:31pm

आदरणीय चंद्रेश जी आपकी कहानी को सत सत नमन , समाज की वो सोच जो अपने बच्चों को हमेशा अपने अहम् से लेकर जोड़ते हैं उनके लिए शानदार सीख है 

Comment by Dr. Vijai Shanker on March 7, 2016 at 11:51am
और प्यार से बोले , " कोई फ़िक्र की बात नहीं बेटे , और भी बहुत से क्षेत्र हैं जिंदगी में सफल होने के लिए , जिस काम में मन लगे हमारा बेटा वो करेगा। "
उन्हें संतोष था की उन्हें एक नया मार्ग मिल गया था , बेटे के चेहरे पर चमक थी , कुछ मन का करने की "
बहुत बहुत बधाई ,आदरणीय चंद्रेश जी , बहुत ही प्रेणनादायक लघु-कथा , सादर।
Comment by TEJ VEER SINGH on March 7, 2016 at 10:53am

हार्दिक बधाई आदरणीय चंद्रेश जी!सुंदर लघुकथा!

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