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रफ़्ता रफ़्ता महके गुलशन साँसों के (ग़ज़ल राज )

२२  २२   २२   २२   २२  २

 

हँसते दर्पण जब जब तेरी आँखों के

रफ़्ता रफ़्ता महके गुलशन साँसों के

 

धीमे धीमे होती है ये  रात जवाँ

ख़्वाब मचलते हैं प्यासे पैमानों के

 

कैसे डूबे  भँवरों में  किश्ती नादां

सिखलाते हमको गड्ढे रुखसारों के

 

गोया नभ से चाँद उतर आया कोई        

चेह्रे से  हटते ही साए  बालों के

 

पार उतर आये हम  तूफां से बचकर

मस्त सफीने पाए  तेरी  बाहों  के 

 

खूब शफ़ा मिलती है गम के छालों को

जब  लगते हैं मर्हम तेरी बातों के

 

 अपने आँगन में भी महके फूल कभी 

 मौसम  आते जाएँ ये  मुलाकातों के

 

चाहे कितनी गर्दिश में हो हम दोनों  

टूटें ना ये  कौल हमारे  वादों के 

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 12, 2016 at 9:43am

घर में बच्चे छुट्टियों में आये हुए हैं १५ मई को मुझे साथ भी लेकर जा रहे हैं आप भी मेरी  व्यस्तता समझ सकते हैं कई दिनों के बाद अति व्यस्तता के बावजूद आज वक़्त निकाल कर पोस्ट पर आना हुआ |आपकी बातों से पूर्णतः सहमत हूँ किन्तु इस मिसरे में शुरू से ही गड़बड़ मुलाक़ात शब्द को लेकर हो रही है मूलाकात कर नहीं सकती शब्द की यहाँ डीमांड है इसी लिए ये रस्साकशी चल रही है | आपको ग़ज़ल बढ़िया लगी हार्दिक आभार आ० सौरभ जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 2, 2016 at 11:52pm

बढिया.. ! 

मगर अचानक मिसरा आया - मौसम  आते जाएँ ये  मुलाकातों के  

आदरणीया, हलवे के मुलायम मधुर ग्रास में गोया कंकड़ पड़ गया !  

आप ऐसी बहर को मात्रिक बहर कहती हैं न तो समकल के बाद समकल और त्रिकल के बाद त्रिकल वाला फ़ॉर्मूला क्यों नहीं अपनातीं ? -

१. सम सम सम सम सम लिखते हैं 

२. विषम विषम पर सम लिखते हैं 

जय हो.. 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 1, 2016 at 3:40pm

जयनित कुमार जी ,आपको ग़ज़ल पसंद आई तहे दिल से आभार आपका |

Comment by जयनित कुमार मेहता on April 30, 2016 at 8:35pm
आ. राजेश कुमारी जी! बहुत सुन्दर और रूमानियत से भरपूर ग़ज़ल कही आपने। बधाई स्वीकारें!

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 28, 2016 at 6:11pm

आ०  रवि भैया ,ग़ज़ल पर आपकी शिरकत और दाद से प्रसन्न हूँ इस ग़ज़ल पर एक स्वस्थ चर्चा हो रही है इस ग़ज़ल के लिए ये बहुत अच्छा संकेत है जब लोग किसी रचना की रूह में उतर कर समीक्षा करते हैं तो उस रचना का समझो भाग्य खुल जाता है तस्दीक जी ,मिथिलेश भैया के साथ साथ आप सभी के विचारों का स्वागत करती हूँ मिसरे तो मूल पोस्ट में सुधार चुकी हूँ इसमें भी एडिट कर लूँगी |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 28, 2016 at 6:06pm

आ० धर्मेन्द्र जी,आपको ग़ज़ल पसंद आई आपका दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया |

Comment by Ravi Shukla on April 28, 2016 at 12:08pm

आदरणीयाा राजेश दीदी बड़ी खूबसूरत रवायती अंदाज की गजल हुई है दिली दाद और मुबारक बाद हाजिर है पढ़ते समय हमेंं भी अंतिम दो शेेर पर प्रवाह में कठिनाई आइै थी पर ये जानते हैै कि शिल्‍प में कही कोई चूक नहीं है फिर आपकी गजल पर हुई चर्चा भी पढ़ी निवेदन सिफ इतना है कि अच्‍छी गजल अगर मिसरों मेंं थोड़े से संशोधन से और अच्‍छी बेदाग हो सकती है तो आप अवश्‍य करेंगी । 

छाेटा मुह बड़ी बात न लगे तो  

कभी न टूटे कौल हमारे वादों के  पर भी विचार कर सकती है आप सादर 

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 27, 2016 at 10:38pm

बड़ी ख़ूबसूरत ग़ज़ल हुई है आदरणीया राजेश कुमारी जी, दाद कुबूल करें। बाकी मिथिलेश जी कह ही चुके हैं।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 27, 2016 at 10:03am

मिथिलेश भैय्या ,ग़ज़ल पर आपकी दाद ने होंसला बढाया तहे दिल से शुक्रिया |मिसरों पर आपकी इस्स्लाह काबिले गौर है 

दरअसल मैं अंतिम शेर के मिसरे में ना के प्रयोग से बचना चाह रही थी किन्तु मेरे जानकार एक वरिष्ट शायर ने कहा कोई प्रोब्लम नहीं है 

आपका क्या ख़याल है इन्हें देखें ---

अपने आँगन में भी महके फूल कभी 

 मौसम आते  जाएँ ये मुलाकातों के---आपने सही सुझाया (मैंने पहले ऐसे भी कर के देखा था किन्तु कई बार हम खुद गलती कर बैठते हैं) 

 

चाहे कितनी गर्दिश में हो हम दोनों  

 टूटें ना  ये  कौल हमारे  वादों के


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 27, 2016 at 9:58am

आ० नीलेश भैय्या आपको ग़ज़ल पसंद आई मेरा लिखना सार्थक हुआ अब मिसरों को इस तरह संशोधित कर रही हूँ नजरें सानी करें प्लीज 

अपने आँगन में भी महके फूल कभी 

 मौसम आये  जाएँ ये मुलाकातों के

 

चाहे कितनी गर्दिश में हो हम दोनों  

 टूटें ना  ये  कौल हमारे  वादों के -----(यहाँ ना का प्रयोग करना पड़ रहा है एक बड़े वरिष्ठ शायर की इस्स्लाह से ये हिम्मत की है आपकी क्या राय है |

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