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इतिहास गवाह है(लघुकथा )राहिला

एक बड़े ही अनुकूल सर्व सुविधा युक्त घूरे पर बर्षों से घरेलू मक्खियों की पीढ़ियां मजे से जिंदगी बसर कर रही थीं। ऐसे में ना जाने कौन साफ तबियत वाले ने नगर पालिका को घूरा हटाने का आवेदन दे मारा । इसकी खबर जैसे ही मख्खियों को लगी, उनमें खलबली मच गई । उन्हें इतना व्यथित देख,एक बूढ़ी सियानी मक्खी ने सांत्वना दी ।
"अरे इतना क्यूं घबरा रही हो? इतिहास गवाह है, आजतक हमें कोई नहीं मिटा पाया । "
"लेकिन दादी मख्खी! अगर नगर पालिका वाले सचमुच आ गये तो,हम बच्चों को लेकर कहाँ जायेंगे? "
"कहीं नहीं, अब्वल तो वो निकम्में एक बार में आते नहीं, फिर अगर आ मरे भी,तो ये आसपास के इंसान तो नहीं मरे ना !"

.
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Rahila on July 8, 2016 at 8:40pm

बहुत शुक्रिया आदरणीय परवेज जी!सादर

Comment by Parvez khan on July 8, 2016 at 8:25pm
सही कटाक्ष
Comment by Rahila on June 8, 2016 at 8:19pm
बहुत, बहुत शुक्रिया आदरणीय जवाहर लाल जी! सादर प्रणाम ।
Comment by JAWAHAR LAL SINGH on June 7, 2016 at 10:05am

वाह बहुत ही अचूक कटाक्ष!

Comment by Rahila on June 6, 2016 at 12:24pm
बहुत आभार आपका आदरणीयाद प्रतिभा दी! वाकई मख्खियां बहुत बेखौफ हो गयीं हैं।सादरनमन
Comment by Rahila on June 6, 2016 at 12:21pm
बहुत शुक्रिया आदरणीया तनुजा जी! बहुत आभार ।सादर प्रणाम
Comment by Rahila on June 6, 2016 at 12:20pm
बहुत शुक्रिया आदरणीय उस्मानी भाई । बहुत आभार । सादर
Comment by Rahila on June 6, 2016 at 12:19pm
बहुत शुक्रिया प्रिय जानकी दी! सादर आभार ।
Comment by pratibha pande on June 6, 2016 at 11:39am

मक्खिया भी समझदार और बेख़ौफ़ हो गयी हैं    अच्छा कटाक्ष है हमारे सफाई के नारों  पर ,  बधाई प्रेषित है आपको प्रिय राहिला जी  

Comment by TEJ VEER SINGH on June 5, 2016 at 8:28pm

हार्दिक बधाई राहिला जी!बेहतरीन लघुकथा!

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