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रिश्तों को समझ जाएगी ...

रिश्तों को समझ जाएगी ...


न आवाज़ हुई
न किसी ने कुछ महसूस किया
इक जलजला आया
इक सूखा पत्ता
दरख़्त से गिरा
और बेनूर हुआ
इक आदि का
अंत हुआ
सीने में ही घुट गया
किसी अपने के खोने का दर्द

हरी कोपल हँसी
जीवन के इस खेल का
ए दरख़्त
अफ़सोस कैसा ?

नमनाक नज़रों से
दरख़्त
आरम्भ को देखता रहा
गिरते हुए पत्तों में
रिश्तों का अंत
देखता रहा
वो अंश था मेरा
जो इस तन से
टूट गया
बेबसी की डोर पे
एक रिश्ता रूठ गया

तुम नादान हो
जीवन से अनजान हो
तुम पर बहारें मेहरबान हैं
खिजां जब आती है
मिलन के गर्भ में
वियोग दिखा जाती है
अनन्त राह का
अंत दिखा जाती है
एक पत्ता गिरता है
इक खरोंच आ जाती है
क्या होता है रिश्ता
ये ख़िजां सिखा जाती है
इसलिये ए कोपल
इंतज़ार कर
तू भी इक दिन
मेरा दर्द समझ जाएगी
फिर तुझे
हंसी नहीं आएगी
इक बेबसी होगी
जब तू
रिश्तों को समझ जाएगी

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by Sushil Sarna on September 11, 2016 at 4:10pm

आदरणीया Alka Changa  जी आपकी आत्मीय प्रशंसा से रचना उपकृत हुई।  आपका हार्दिक आभार। 

Comment by अलका 'कृष्णांशी' on September 9, 2016 at 9:29pm

क्या होता है रिश्ता ,ये ख़िजां सिखा जाती है। ...........प्रतीकों  के माध्य्म  से गहरा सन्देश ... आदरणीय सुशिल जी  हार्दिक बधाई |

Comment by Sushil Sarna on September 8, 2016 at 3:48pm

आदरणीया कल्पना जी आपकी आत्मीय प्रशंसा से रचना उपकृत हुई।  आपका हार्दिक आभार। 

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on September 7, 2016 at 11:07pm

वाह | आदरणीय सुशिल जी बहुत बढ़िया रचना हुई है यह भी | हार्दिक बधाई |

Comment by Sushil Sarna on September 7, 2016 at 1:38pm

आदरणीय रामबली गुप्ता जी प्रस्तुति  को अपने स्नेह बंधन से उपकृत करने का हार्दिक आभार। 

Comment by रामबली गुप्ता on September 7, 2016 at 5:44am
वाह आद० क्या खूब बिम्ब बांधते हैं आप। बिम्बों एवं प्रतीकों के अनुपम प्रयोग से कविता के भावों को चरम तक पहुंचा देते हैं आप। बेहतरीन अतुकांत दिल से बधाई लीजिये।
Comment by Sushil Sarna on September 5, 2016 at 4:59pm

आदरणीय समर कबीर साहिब प्रस्तुति में निहित भावों की गहनता को अपनी आत्मीय स्वीकृति से अलंकृत करने का तहे दिल से शुक्रिया।  सर इंगित टंकण त्रुटि के तरफ ध्यान आकर्षित करने का शुक्रिया।  मैं इसे अभी एडिट किये देता हूँ।  आपका दिल से आभार। 

Comment by Samar kabeer on September 4, 2016 at 6:02pm
जनाब सुशील सरना जी आदाब,आजकल आप कमाल पर कमाल कर रहे हैं भाई,एक के बाद एक शानदार प्रस्तुति,अल्लाह नज़र से बचाये,आमीन ।
हमेशा की तरह ये कविता भी बहुत ख़ूब लिखी आपने,अच्छा सन्देश दिया है प्रतीकों के माध्यम से,ढेरों बधाई स्वीकार करें इस बहतरीन प्रस्तुति पर ।
15वीं पंक्ति में 'नामनाक'को "नमनाक"कर लीजियेगा कि सही शब्द यही है ।

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