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अतुकांत कविता : श्रद्धांजलि (गणेश जी बागी)

श्रद्धांजलि
राज पथ पर अवस्थित
शहीद चौक ..
लोगो का हुजूम
मिडिया वालों का आवागमन
चकमक करते कैमरे
चमकते-दमकते चेहरे
फोटो खिंचाने की होड़
हाथों में मोमबत्तियाँ
नहीं-नहीं, कैंडल....
साथ में लकदक पोस्टर, बैनर
जिनपर अंकित था -
'शहीदों को
अश्रुपूरित श्रद्धांजलि' !!

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 12, 2016 at 10:12pm

मीडिया को साथ लिए बिना तो यहाँ कुछ नही होता नाम भी तो होना चाहिए कि फलां पार्टी ने श्रद्धान्जलि जी फलां पार्टी का जुलूस निकला टीवी में भी तो आना चाहिए ..वाह्ह्ह्हह  नपे तुले शब्दों में क्या कटाक्ष किया है बहुत बढिया प्रस्तुति आद० गणेश बागी जी हार्दिक बधाई \रचना पर देर से पँहुचने का खेद है |

Comment by Ravi Shukla on October 6, 2016 at 5:50pm

आदरणीय गण्‍ोश जी बिल्‍कुल नपी तुुली संयत प्रतिक्रिया, शानदार तंज के लिये बधाई ।  बहुत खुब 

नहीं नहीं कैंडल  इन  तीन शब्‍दों ने ही बहुत कुछ कह दिया वाह 

Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on September 27, 2016 at 8:54am
आदरणीय श्री गणेश जी बागी यथार्थ को दर्शाती सुन्दर व्यंग्य रचना पर हार्दिक बधाई प्रेषित है । सादर ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on September 26, 2016 at 4:16pm

सामयिक विषय पर अच्छी तंजिया रचना हुई है आ. गणेश जी बागी जी बहुत बहुत बधाई आपको


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 25, 2016 at 8:03pm

आदरणीय समर साहब प्रणाम, आपका आशीर्वाद किसी भी रचना को सार्थकता प्रदान करता है, दिल से आभार व्यक्त करता हूँ आदरणीय. 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 25, 2016 at 8:01pm

आदरणीय शेख उस्मानी जी, इस प्रोत्साहन करती टिप्पणी हेतु दिल से आभार व्यक्त करता हूँ.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 25, 2016 at 8:00pm

आदरणीय डॉ विजय साहब प्रणाम, इस कविता को आपका आशीर्वाद प्राप्त हुआ, मन मुग्ध है, आपका बहुत बहुत आभार.

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 25, 2016 at 7:00pm

आहा----- आ० बागी जी  इस छोटी सी रचना में गजब का व्यंग है जो व्यवस्था के पाखण्ड का पर्दाफ़ाश करता है , बधाई आदरणीय .

Comment by Samar kabeer on September 25, 2016 at 3:36pm
जनाब गणेश जी 'बागी'जी आदाब,बहतरीन तंज़ के साथ सत्य को उजागर करती इस शानदार कविता के लिये दिल से बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on September 25, 2016 at 1:02pm
मात्र जश्न-ए-तकनीकी! मानव-मशीनें यंत्रों से युक्त , कर्तव्य-मुक्त! बेहतरीन कटाक्ष पूर्ण रचना।

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