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ग़ज़ल-बन के' सूरज सा' जमाने में' निकलते रहिये-रामबली गुप्ता

वह्र-2122 1122 1122 22

बन के' सूरज सा' जमाने में' निकलते रहिये,
हर अँधेरे को' उजाले मे' बदलते रहिये।

जिंदगी एक सफर खुशियों' भरा हो साहिब!
हर कदम आप मेरे साथ जो' चलते रहिये।।

दिल के' मन्दिर में उजाले की' वज़ह आप सनम,
अब तो इस दिल मे' सदा ज्योति सा' जलते रहिये।

दिल की बगिया में बहारों के सुमन मुस्काएं,
इसमें गर रोज सनम आप टहलते रहिये।

मैं जो' हूँ साथ जमाने से' भला डर कैसा?
हो के मायूस न यूं शाम से ढलते रहिये।

मेरे' हर गीत-ग़ज़ल-नज़्म-तरानों में' सनम!
बन के' अब शब्द नये प्यार के ढलते रहिये।।

दिल की बगिया में खिले प्यार के फूलों को सनम!
यूं जफ़ा के पा' तले भी न मसलते रहिये।।

लूटते चैन अमन जो भी वतन का साहब!
ऐसे' साँपो के' उठे फण को' कुचलते रहिये।

रचना-रामबली गुप्ता
मौलिक एवं अप्रकाशित

पा=पैर

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Comment by Ravi Shukla on October 12, 2016 at 3:45pm

आदरणीय राम बली जी बहुत बहुत बधाई इस सुन्‍दर गजल के लिये । आदरणीय समर साहब की चर्चा से वार्ता में समरसता बढ़ गई है 

Comment by Samar kabeer on October 11, 2016 at 5:12pm
मिसाल के तौर पर,मेरे महबूब,जानम, जानां,जान ये सारे शब्द ज़रूरत के मुताबिक़ ले सकते हैं ।
Comment by रामबली गुप्ता on October 10, 2016 at 10:12pm
आद0 समर भाई साहब आपके प्रोत्साहन और सराहना से दिली खुशी हुई। किसी भी रचना में एक ही शब्द का एक ही मायने में कई बार प्रयुक्त होना पुनरुक्ति दोष होने के साथ साथ पढने और सुनने में कटु लगता है। चूंकि ग़ज़ल का प्रत्येक शेर अपने आप में एक इकाई होता है इसलिए इसे दोष नही मानते लेकिन है तो एक ही ग़ज़ल में इसलिए यथा संभव दुहराव से बचना सर्वथा उचित ही है। सनम शब्द का कई जगह रखना मुझे भी खटका था और कर्णकटु भी लगा किन्तु क्या कहूँ समस्या ये है भाई साहब कि मैं ठहरा हिंदी का छात्र मेरे पास उर्दू शब्दकोश शून्य है। हिंदी में एक शब्द "प्रिये" है किन्तु यह संस्कृतनिष्ठ होने के कारण प्रयुक्त करना उचित न लगा। शब्दकोश की कमी के कारण कभी कभी रचनाकर्म में बड़ी कठिनाई उठानी पड़ती है। सनम का कोई दूसरा विकल्प आप सुझाईये ।सानुरोध
Comment by Samar kabeer on October 10, 2016 at 9:03pm
जनाब रामबली गुप्ता जी आदाब,बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल हुई है, मज़ा आ गया,वाह बहुत ख़ूब, शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।
एक बात अर्ज़ करना चाहूंगा,आपकी ग़ज़ल में चार बार "सनम" शब्द इस्तेमाल हुआ है जो कि दोष तो नहीं है,मेरा कहना सिर्फ़ इतना है कि अपने महबूब को किसी दूसरे नाम से भी पुकारें भाई हा हा हा..
Comment by रामबली गुप्ता on October 10, 2016 at 4:32pm
धन्यवाद भाई सुरेन्द्र नाथ जी
Comment by रामबली गुप्ता on October 10, 2016 at 4:24pm
आद0 वासुदेव भाई जी सराहना के लिए धन्यवाद
Comment by रामबली गुप्ता on October 10, 2016 at 4:23pm
हार्दिक आभार आद0 सुरेश भाई जी
Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on October 10, 2016 at 5:34am
आदरणीय रामबली जी खुबसूरत अशआर के साथ गजल के लिए बधाई कबूल फरमायें
Comment by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on October 9, 2016 at 9:17pm
आ.रामबली गुप्ताजी शेर दर शेर सुंदर ग़ज़ल की बधाई स्वीकारें।
Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on October 9, 2016 at 8:16pm
लूटते चैन अमन जो भी वतन का साहब!
ऐसे' साँपों के' उठे फण को' कुचलते रहिये।
वाह आदरणीय रामबली गुप्ता जी बहुत ही सुन्दर विचारों से नवाजा है गजल को।हार्दिक बधाई स्वीकार करें । सादर ।

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