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एक दिन कुछ अलग हुआ
समुन्दर और आकाश के बीच
आकाश को देख समुन्दर चिल्लाया
मेरी जगह तुम आ जाओ
यह बात सुनकर आकाश मुस्काया
बोला ठीक है करलो ये प्रयास
सारी मछलियां गभरायीं
अब पंख कहाँ से लायें
चिड़िया उनको देख मुस्काईं
जैसे हम जल में तैरेंगे
तुम सब हवा में उड़ जाना
यह सब देख धरा मुस्काई
दोनों की कैसे खत्म करूँ लड़ाई
पूछा उसने समुन्दर से
दादा बोलो मैं कहाँ जाऊँ
वन , जंगल कहाँ ले जाऊँ?
आकाश से भी पूछा उसने
दिन और रात का क्या होगा
क्या समन्दर से सूरज आएगा ?
पानी से आग निकलेगी
मछली पक्षी बन चाहेंगी
पक्षी जलचर बनेंगे
पशु और मानव फिर कहाँ रहेंगे ?
क्या हुआ फिर सभीका
सोचे जो ये खाये मेवा ।
सब को देख बोला उल्लू
क्यों लड़ते हो बेवजह ही
सबकी अपनी अपनी जगह है ।
उलट सुलट संभव न होगा
कुदरत से विपरीत न होगा ।


मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on December 28, 2016 at 4:19pm
धन्यवाद आदरणीय विनय सर ।
Comment by विनय कुमार on December 28, 2016 at 4:10pm

प्रकृति से जिसने भी छेड़छाड़ की, उसका हमेशा गलत परिणाम ही निकला है| बढ़िया कल्पना आ, बधाई आपको 

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on December 25, 2016 at 9:21pm
आदरणीय डॉ गोपाल नारायन सर जी । मेरे मन में एक बात आ रही थी कि कभी कभी हम जानते हुए भी की लड़ाई निरर्थक होती है ,कुछ ऐसे विषय या कारण से लड़ पड़ते है जिसका कहीं भी सर पैर नहीं होता है । आपका कहना भी सही है । आप गुणीजनों के मार्गदर्शन की अभिलाषी हूँ । कृपया मार्गदर्शन करें मेरा । सादर ।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 25, 2016 at 8:03pm

आ० कल्पना जी . इस कल्पना को क्या कहूं . अतिरंजित  या अजगुत . गुनीजन की सम्मति अपेक्षित .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 24, 2016 at 1:36am

आदरणीया कल्पना जी इस प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई. सादर 

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on December 23, 2016 at 7:48am
धन्यवाद आदरणीय आशीष यादव जी ।
Comment by आशीष यादव on December 23, 2016 at 1:35am
Prakriti ki bnai hr chij vyawasthit h. Sbki apni apni jagah h. Sundar sandesh wali kawita.
Rachna pr badhai.

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