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स्मृति के आँगन में ...

स्मृति के आँगन में ...

तुम सवालों को
सवाल क्योँ नहीं रहने देती
अपनी मौनता से
तुम नैन व्योम में बसी
अतृप्त तृष्णा से
अपने कपोलों पर
क्योँ गीले काजल से श्रृंगार
कर अनुत्तरित प्रश्नों का
उत्तर चाहती हो

क्योँ सुरभित मधु पलों को
अपने गीले आँचल में लपेट कर
स्मृति अंकुरों को
प्रस्फुटित होने का अवसर
देना चाहती हो

क्योँ मृदु चांदनी में
उदास निशा से
टूटे तारे से माँगी इच्छा के
अपूर्ण रहने का उत्तर
माँगना चाहती हो

क्योँ अपनी कुसुमांजलि में
किसी की प्रतीक्षा में
प्रति क्षण मुरझाते पुष्पों से
उनके मुरझाने का
कारण जानना चाहती हो

शायद तुम भी नहीं जानती
तुम ये क्योँ चाहती हो

शायद उस बटोही के लिए
जो स्पर्श स्पंदन की
अनुभूति दे ओझल हो गया
और
अपने आभास के महकते चन्दन से
हृदय में
मधुऋतु के अव्यक्त क्षणों का
अमिट लेख लिख गया

एक सवाल के कई उत्तर
या
एक उत्तर के कई सवाल

देखो जब तक ये सवाल
कुसुमित पलकों पर
भ्रमर से मंडराते रहेंगे
उसकी याद के तमाम तृण
तुम्हारी स्मृति के आँगन में
इक घरोंदा बनाते रहेंगे
तुम्हारे जीवन के
हर पल को
उसके आने की आस से
मृदुल बनाते रहेंगे


सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

Views: 545

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Comment by Sushil Sarna on January 13, 2017 at 3:07pm

आदरणीय   Mohammed Arif  साहिब प्रस्तुति आपकी आत्मीय प्रशंसा की हार्दिक अभारी है। आपकी स्नेहाशीष का हार्दिक आभार।

Comment by Sushil Sarna on January 13, 2017 at 3:06pm

आदरणीय   सुनील प्रसाद(शाहाबादी)  साहिब प्रस्तुति आपकी आत्मीय प्रशंसा की हार्दिक अभारी है।  हार्दिक आभार।

Comment by Sushil Sarna on January 13, 2017 at 3:06pm

आदरणीय  Tasdiq Ahmed Khan साहिब प्रस्तुति आपकी आत्मीय प्रशंसा की हार्दिक अभारी है। आपकी स्नेहाशीष का हार्दिक आभार।

Comment by Mohammed Arif on January 12, 2017 at 11:55pm
आदरणीय सुशील सरनाजी, सुंदर भावों की पीठिका पर विराजित कविता के लिए हार्दिक बधाई !
Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on January 12, 2017 at 8:42pm
बहुत सुंदर भावप्रद कविता आदरणीय हार्दिक बधाई इस प्रस्तुति हेतू।
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on January 12, 2017 at 7:18pm

मुहतरम जनाब सुशील सरना साहिब , स्मृति की मंज़र कशी करती सुन्दर कविता के लिए , मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं

Comment by Sushil Sarna on January 12, 2017 at 6:42pm

आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी प्रस्तुति के भावों ने आपकी भावनाओं को छुआ, सृजन सफल हो गया। आपके द्वारा इंगित त्रुटि मैं अभी संशोधित कर पुनः पोस्ट करता। आपकी इस सूक्ष्म दृष्टि एवम सुझाव का हार्दिक आभार।

Comment by Sushil Sarna on January 12, 2017 at 6:42pm

आदरणीय समर कबीर साहिब प्रस्तुति आपकी आत्मीय प्रशंसा की हार्दिक अभारी है। आपकी स्नेहाशीष का हार्दिक आभार।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 12, 2017 at 4:55pm

आदरणीय सुशील सरना सर, हृदय में उतरकर, संवेदनाओं को झंकृत करती बहुत बढ़िया भावाभिव्यक्ति हुई है. इस प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई. अनुतरित को अनुत्तरित कर लीजियेगा. सादर 

Comment by Samar kabeer on January 12, 2017 at 1:49pm
जनाब सुशील सरना जी आदाब,बहुत सुंदर जज़्बाती कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।

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