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गजल(तीर चले चुन चुन के कस कस)

22222222
तीर चले चुन-चुन के कस-कस
मन तो भूला जाता सरबस।1

बूढ़ा बरगद बौराया है
अँगिया- गमछा करते सरकस।2

छौंरा- छौंरी छुछुआये हैं
पुरवा घर-घर करती बतरस।3

बढ़नी लेकर काकी दौड़ी
सच तो सहना पड़ता बरबस।4

फागुन की फुनगी अँखुआयी
चौरा-चौरा होता चौकस।5

आतुर होकर आज हवाएँ
ढूँढ़ रहीं निज मरकज,बेकस।6

मन का मीत कहीं मिल जाये
मनुआ दौड़ चला जस का तस।7

रंग चढ़ा जिसको,वह उछले
बाकी कहते,रहने दो बस।8

कुछ तो घाव 'मनन' भरने दो
मौसम हो जाने दो समरस।9
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

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Comment by Manan Kumar singh on February 7, 2017 at 10:49pm
बहुत बहुत आभार आदरणीय बृजेश जी।
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 7, 2017 at 10:28pm
वाह आदरणीय बहुत ही सुन्दर ..सौंधी मिटटी की खुशबु की तरह है ये ग़ज़ल..हार्दिक बधाइयाँ
Comment by Manan Kumar singh on February 7, 2017 at 7:03pm
आदरणीय आशुतोष मिश्र जी, हौसला आफजाई के लिए दिल से शुक्रगुजार हूँ, सादर।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on February 7, 2017 at 1:06pm

आदरणीय मनन जी सुंदर ग़ज़ल हुयी है ..इस रचना के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें सादर 

Comment by Manan Kumar singh on February 6, 2017 at 8:42pm
बहुत बहुत आभारी हूँ आदरणीय समर जी।
Comment by Samar kabeer on February 6, 2017 at 8:37pm
मनन भाई मिटटी भी आप ही की है, और गढ़ा भी आपने,मैंने तो तरकीब बताई है बस । वैसे इस मंच पर तो सभी उस्ताद हैं और सभी शागिर्द ,आपकी मुहब्बतों के लिये शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Manan Kumar singh on February 6, 2017 at 7:30pm
अब यदि शागिर्द कबूल कर लिया जाऊं, तो खुशकिस्मत!
Comment by Manan Kumar singh on February 6, 2017 at 7:27pm
आदरणीय मिथिलेश जी शुक्रिया व आदाब! गजल हो गयी,पर श्रेय आदरणीय समर जी को जाता है।मैं तो बस इतना ही कहूँगा कि मिट्टी मेरी थी,गढ़ा उसे काबिल उस्ताद समर साहब ने।हाँ मेरी तलाश मुकम्मल हुई,
मुझे एक उस्ताद की मिल गये। आप और उस्ताद दोनों को सादर नमन!
Comment by Samar kabeer on February 6, 2017 at 7:17pm
जी,आपके बग़ैर तो ओबीओ मुकम्मल ही नहीं होता भाई ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 6, 2017 at 6:28pm

जी, हम सब में इस नाचीज़ को भी शामिल मानिये. सादर 

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