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हमने सांसें भी गिरवी रख दी हैं (ग़ज़ल)

2122 1212 22

मुझको सच कहने की बीमारी है
इसलिए तो ये संगबारी है

अपने हिस्से में मह्ज़ ख़्वाब हैं,बस!
नींद भी, रात भी तुम्हारी है

एक अरसे की बेक़रारी पर
वस्ल का एक पल ही भारी है

चीरती जाती है मिरे दिल को
याद तेरी है या कि आरी है?

हमने साँसें भी गिरवी रख दी हैं
अब तो ये ज़िन्दगी उधारी है

सब तो वाकिफ़ हैं आखिरी सच से
किसलिए फिर ये मारा-मारी है?

नींद का कुछ अता-पता तो नहीं
रात है, ख़्वाब हैं, ख़ुमारी है।

(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 546

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Comment by गिरिराज भंडारी on March 21, 2017 at 3:25pm

आदरनीय जयनित भाई , अच्छी गज़ल कही , बधाइयाँ स्वीकार करें ।  महज़ की मात्रिकता  12 या 21 .. क्या हो ये सोचने लायक बात है ।

Comment by Ravi Shukla on March 21, 2017 at 11:55am

आदरणीय जयनित जी बडि़या गजल कही है आपने

नींद भी रात भी तुम्‍हारी है बहुत खूब  बधाई स्‍वीकार करें

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 19, 2017 at 4:55pm
वाह बहुत खूबसूरत गजल
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on March 18, 2017 at 11:13pm
आदरणीय जयनित भाई,बेहतरीन अशआर हुए हैं तहेदिल मुबारकबाद
Comment by Mohammed Arif on March 17, 2017 at 5:56pm
आदरणीय जयनित कुमार जी आदाब, हर शेर उम्दा । दाद के साथ मुबारक़बाद क़ुबूल कीजिए ।

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