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ग़ज़ल नूर की-रोज़ जो मुझ को नया चाहती है

२१२२/११२२/२२ (११२)

रोज़ जो मुझ को नया चाहती है
ज़िन्दगी मुझ से तू क्या चाहती है?
.
मौत की शक्ल पहन कर शायद
ज़िन्दगी बदली क़बा चाहती है.
.
मशवरे यूँ मुझे देती है अना
जैसे सचमुच में भला चाहती है.
.
इक  सितमगर जो  मसीहा भी न हो,
नई दुनिया वो  ख़ुदा चाहती है.
.
“नूर’ बुझ जाये चिराग़ों की तरह
क्या ही नादान हवा चाहती है. 
.
निलेश"नूर"

मौलिक/ अप्रकाशित 

Views: 1289

Comment

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 4, 2017 at 7:01pm

शुक्रिया आ. डॉ. आशुतोष जी 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 4, 2017 at 6:58pm
बहुत खूब ग़ज़ल हुई आदरणीय..अग्रजों की टिप्पड़ी से काफी कुछ सीखने को मिला..मशविरे को लेकर मैं भी असमंजस में हूँ गुणीजन बात साफ करें तो आसानी होगी..अगर मशविरा से आसय सलाह है तो सलाह आपस में की भी जाती है दूसरों को दी भी जाती है..सादर
Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 3, 2017 at 5:56pm

आदरणीय नूर जी आपकी इस ग़ज़ल के माध्यम से विद्वतजनो की प्रतिक्रियाओं से तमाम जानकारी मिली . 

मशवरे यूँ मुझे देती है अना 
जैसे सचमुच में भला चाहती है इस शेर के लिए बिशेष रूप से बधाई सादर 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 3, 2017 at 3:40pm

जी आ. तस्दीक़ साहब... मैं ग़लत समझ बैठा 
सादर 

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on May 3, 2017 at 2:37pm
मुहतरम नीलेश साहिब,ख़ल्क़ कामतलाब

मुहतरम नीलेश साहिब,ख़ल्क़ का मतलब "दुनिया के लोग " होता है ,परलोक नहीं ?
Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 3, 2017 at 11:19am
Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 3, 2017 at 11:17am
Comment by Ravi Shukla on May 3, 2017 at 10:56am

आदरणीय नीलेश जी अच्‍छी ग़ज़ल के लिये दिली मुबारक बाद पेश है

मशवरे यूँ मुझे देती है अना
जैसे सचमुच में भला चाहती है.
  ये शेर बहुत पंसद आया बधाई

हमने भी एक शेर में मश्‍वरा देना का इस्‍तेमाल किया था तो एक इस्‍लाह मिली   और कहा कि मश्‍वार आपस मे किया जाता है दिया नहीं जाता । इस मंच पर विद्वतजन की टिप्‍पणी क्‍या आती है । ये प्रतीक्षा है । सादर

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 2, 2017 at 10:06pm

शुक्रिया आ. तस्दीक़ साहब ....खल्क पहुँचू तो वहाँ की बात करूँ.... अभी दुनिया में हूँ तो यहाँ कि नुमाइन्दगी करना बेहतर होगा ...
...
5 वें शेर के सानी मिसरा अपने आप में पूरा है .... क्लासिकल शाइरी पढेंगे तो ऐसा ही लिखा पायेंगे ...
यह   ही में वो  तंज़ कहाँ जो क्या ही में है ..
सादर 

Comment by Samar kabeer on May 2, 2017 at 9:37pm
'यह ही नादान हवा चाहती है'

भाई तस्दीक़ जी आपके सुझाये मिसरे में ऐब-ए-तनाफ़ुर नज़र नहीं आया आपको ?

कृपया ध्यान दे...

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