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'अजय' बीते जमाने में कहीं कुछ छोड़कर आया,

जरा सा सोंचकर देखा तो मुझको याद कर आया,
'अजय' बीते जमाने में कहीं कुछ छोड़कर आया,

सजी यारों की महफिल थी बड़ा बेखौफ बचपन था,
बड़ी मजबूरियों ने रास्तों पर जाल बिछवाया,

ज़माने को समझने की बड़ी पुरजोर कोशिश की,
ज़माने की नसीहत ने ही मुझको और भरमाया,

जिन्हें अपना समझ बैठे थे सारी भूलकर शर्तें,
उन्हीं के कारनामों ने ही मुझको और तड़पाया,

सिवा तेरे जहाँ में और कोई है नहीं मेरा,
मेरे मौला , मेरे मौला तू मेरी रूह में छाया,

अजय शर्मा अज्ञात
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Mahendra Kumar on July 12, 2017 at 10:11pm

आ. अजय जी, ग़ज़ल कहने का अच्छा प्रयास हुआ है. हार्दिक बधाई स्वीकार करें. गुणीजनों की बातों का पालन करें, निस्संदेह लाभ होगा. शुभकामनाएँ. सादर.

Comment by Ravi Shukla on July 9, 2017 at 2:34pm
आदरणीय अजय कुमार शर्मा जी गजल के रूप में आपने जो कहने का प्रयास किया है उसका स्वागत है बहुत बहुत बधाई इसके लिए काफिया रदीफ़ आदि के बारे में जानकारी लीजिये मंच पर काफी सामग्री उपलब्ध है एक बार फिर से मुबारकबाद हाजिर है
Comment by Ajay Kumar Sharma on July 8, 2017 at 7:35pm
आप सभी विद्वानों का कोटिश: धन्यवाद . पूरा प्रयास करूँगा .
Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on July 8, 2017 at 3:39am
अजय जी भाव के लिए बधाई, समर साहब की बातों पर गौर कीजियेगा
Comment by Samar kabeer on July 7, 2017 at 2:50pm
जनाब अजय शर्मा अज्ञात जी आदाब,ग़ज़ल कहने का प्रयास अच्छा हुआ है,लेकिन अभी आपको बहुत कुछ सीखने की ज़रूरत है,बह्र के अलावा शिल्प,क़ाफ़िया रदीफ़ के बारे में मंच पर कई आलेख हैं,उनका अध्यन करें ।
आपने मतले के दोनों मिसरों में एक ही क़ाफ़िया ले लिया,ये ग़ज़ल में दोष कहलाता है,बहरहाल इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 6, 2017 at 10:32pm
भाई अजय जी रचना के भाव अच्छे हैं । हारदिक बधाई स्वीकारें ।

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