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मुझे हिन्दू, उसे मुसलमान रहने दो!

दिल में प्यार

आँखों में सम्मान रहने दो
मंदीर की आरतियों संग
मस्जिद की अज़ान रहने दो
क्यों लड़ना धर्म के नाम पर
क्यों बेकार में खून बहाना
मज़हब के मोहल्लों में
इंसानों के मकान रहने दो
मुझे हिन्दू, उसे मुसलमान रहने दो!

माना सब एक ही हैं
पर थोड़ी अलग पहचान रहने दो
अगरबत्तियों की ख़ुशबू संग
थोडा लोहबान रहने दो
चढाने दो उसको चादरें
मुझे चढाने दो चुनरियाँ
दोनों मज़हब तो सिखाते हैं प्रेम ही
तो थोड़ी गीता थोडा क़ुरान रहने दो
मुझे हिन्दू, उसे मुसलमान रहने दो!

उदास ना हो कोई घर
हर चेहरे पर मुस्कान रहने दो
मेरे त्योहारों की मिठाइयों में
उसके लजीज़ पकवान रहने दो
सजाये मैने भी हैं उसके ताजिये
उसने भी दिए जलाएं हैं घर पर
उसका एक दोस्त राम है
मेरा भी एक दोस्त रहमान रहने दो
मुझे हिन्दू, उसे मुसलमान रहने दो!

“मौलिक व अप्रकाशित”
रणवीर प्रताप सिंह

 

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Comment

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Comment by Mahendra Kumar on September 11, 2017 at 10:15pm

बहुत बढ़िया कविता है आ. रणवीर प्रताप सिंह जी. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. सादर.

Comment by Ranveer Pratap Singh on September 9, 2017 at 5:11pm
@Salim raza rew @Brijesh Kumar @Samar Kabeer aap sabhi ka dhanywad jo aapney meri is kavita ko saraha
Comment by SALIM RAZA REWA on September 9, 2017 at 8:36am
भाई रणवीर जी बधाई swavikaren
Comment by Samar kabeer on September 7, 2017 at 11:31pm
जनाब रणवीर प्रताप सिंह जी आदाब,काश सब आपकी तरह सोचने लगें,बहुत सुंदर कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on September 7, 2017 at 10:07am
बड़ी उम्दा सार्थक रचना है आदरणीय..हार्दिक बधाई

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