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पगलाया विश्वास

आँसुओं-सिंची आस्था

हर धूल भरी पगडण्डी पर अब मानो

फैले हैं पूर्तिहीन स्वप्नों के श्मशान

अकुलाते अनुभवों के कांटेदार गहन सत्य

तकलीफ़ भरे गड्ढों में चिन्ता की छायाएँ

रहस्यात्मक अहातों के उस पार

अन्धकार-विवरों में होगी यकीनन

अनबूझे सपनों की अनबूझी बेचैनी

लौट आएँगी अनायास असंतोष भरी

स्वाभाविक  हमारी  पुरानी  वेदनाएँ

इस पर भी अनजाने-अनपहचाने, प्रिय

न जाने किस-किस आकाशीय मार्ग से

चली आती हैं झोली में सहज कभी-कभार

अपरिभाषणीये कोमल मामूली सचाईयाँ

हृदय-प्राण-सी  सुकुमार  खुशियाँ  अपार

हमारे  ज़िद्दी  स्वप्नों  के  अर्थ  व्यर्थ

किसी टूटी-बिखरी तस्वीर के टुकड़ों-से सही

धूप-तपी राहों पर धूल के कितने बगूले सही

पर उँंगली-पकड़ चलते बच्चे-सा विश्वास है मुझको

आज भी  "तुम्हारे"  सहज भोले  विश्वास  पर, प्रिय

प्राण-प्रिय, मेरी प्राण-स्वप्न

आ चल, मेरे  साथ  चल

अभी बाकी है मेरा पगलाया विश्वास 

सुन मेरी बेचैन ज़िन्दगी

तू  अभी  किवाड़  बन्द  न  कर

               ------

-- विजय निकोर

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by vijay nikore on November 5, 2017 at 9:16pm

//रचना शैली और भाव विवेचना अद्भुत है//

रचना की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय मोहित जी

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 4, 2017 at 7:14pm

तू  अभी  किवाड़  बन्द  न  कर------------------------------- लम्बी प्रस्तावना के बाद  अटूट विश्वास का सच ------------ यह आख़िरी पंक्ति ही अपने आप में  एक पूर्ण कविता है .  आपकी कवितायें  मन की सह सा गीला कर  देती है . जय हो . सादर .

Comment by vijay nikore on November 4, 2017 at 12:27pm

रचना की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय आशुतोष जी।

Comment by Sushil Sarna on November 3, 2017 at 7:33pm

प्राण-प्रिय, मेरी प्राण-स्वप्न
आ चल, मेरे साथ चल
अभी बाकी है मेरा पगलाया विश्वास
सुन मेरी बेचैन ज़िन्दगी
तू अभी किवाड़ बन्द न कर

वाह सर वाह ... अंतर्मन के भावों का अनुपम सृजन .... सृजन का अंतिम पड़ाव सृजन के आत्मा है ... मजा आ गया सर ... हार्दिक हार्दिक बधाई सर।

Comment by vijay nikore on November 3, 2017 at 5:50pm

//सुंदर भावों का स्फुटन जो अंतर्रात्मा को भी छू गया//

.

रचना की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय मोहम्मद आरिफ़ जी।

Comment by vijay nikore on November 3, 2017 at 6:47am

//बहुत ही बेहतरीन कविता का सृजन करके मन मोह लिया//

.

रचना की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय डा० छोटेलाल सिहं जी।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 2, 2017 at 8:22pm
अद्भुत भावों का समावेश किया है आदरणीय विजय जी..वाह आनंद आ गया..हार्दिक बधाई
Comment by narendrasinh chauhan on November 2, 2017 at 5:46pm

बहुत सुंदर रचना

Comment by Mohit mishra (mukt) on November 2, 2017 at 9:22am
आदरणीय विजय सर आपकी रचना शैली और भाव विवेचना अद्भुत है। बेतरीन कविता के लिए बधाई
Comment by Dr Ashutosh Mishra on November 1, 2017 at 9:43pm
आदरणीय विजय सर रचना को पढ़कर सुखद लगा इस रचना पर हार्दिक बधाई सादर

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