2122 1212 22
दफ़अतन जो निकल गए आँसू।
सारे मंज़र बदल गए आँसू।।
लाख की कोशिशें छुपाने की।
राज़ दिल का उगल गए आँसू।।
इक ख़ुशी ने मुझे पुकारा है।
ये ख़बर सुन के जल गए आँसू।।
ख़ुश्क दामन तुझे बताऊँ क्या।
वो सबब जो सँभल गए आँसू।।
इत्तिफ़ाकन ही ख़ुश्क थीं पलकें।
इंतिकामन मचल गए आँसू।।
इक तबस्सुम जो आगया लब पर।
मारे ग़म के पिघल गए आँसू।।
कौन सा पल मुझे हंसाएगा।
मेरी फ़ितरत में ढल गए आँसू।।
हाथ ख़ाली हैं फिर सहर अपने।
लो तुम्हें फिर से छल गए आँसू।।
मौलिक/अप्रकाशित
Comment
उम्दा ग़ज़ल है आ. अफ़रोज़ जी. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. सादर.
आदरणीय सुरेंद्र नाथ जी ग़ज़ल में शिरकत और सुख़न नाज़ी का शुक्रिया
आद0 अफ़रोज़ जी सादर अभिवादन। बढ़िया ग़ज़ल पर हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिये। सादर
जनाब अफ़रोज़ साहिब ,अच्छी ग़ज़ल हुई है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।
आखरी शेर में अपने को तेरे और तुम्हें को तुझे करने से दोष खत्म हो सकता है ।
आदरणीय अफ़रोज़ साहब, खूबसूरत अशआर हुए हैं. हार्दिक बधाई.
जनाब अफ़रोज़ 'सहर' साहिब आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है, दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
दूसरे शैर के ऊला में 'लाख की' को "लाख कीं"कर लें ।
'वो सबब जो सँभल गये आँसू'
इस मिसरे में 'जो' शब्द भर्ती का है, इस बारीकी को समझाने के लिए एक त्वरित सुझाव है,इसमें तनाफ़ुर न देखें :-
'जिस सबब से पिघल गए आँसू'
'मारे ग़म के पिघल गये आँसू'
ग़म के मारे तो आँसू बहते ही हैं,मेरे ख़याल से ये मिसरा यूँ होना था:-
इस ख़ुशी में पिघल गए आँसू'
आख़री शैर में शुतरगुर्बा देखिये,ऊला में 'अपने',सानी में 'तुम्हें' ।
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