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शरणार्थी(लघुकथा)

दो मित्र आपस में बातें कर रहे थे;एक मानवतावादी था और दूसरा समाजवादी।पहले ने कहा-
अरे भई!वो भी आदमी हैं,परिस्थिति के मारे हुए।बेचारों को शरण देना पुण्य-परमार्थ का काम है।
दूसरा:हाँ तभी तक,जबतक यहाँ के लोगों को शरणार्थी बनने की नौबत न आ जाये।

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by नाथ सोनांचली on March 11, 2018 at 6:06am

आद0 मनन जी सादर अभिवादन। बढिया लघुकथा कही आपने, इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार कीजिये

Comment by Manan Kumar singh on March 9, 2018 at 10:28pm

आपका आभार आदरणीय उस्मानीजी।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on March 9, 2018 at 6:13pm

बहुत बढ़िया जन जागरण और मार्गदर्शन देती विचारोत्तेजक रचना। हार्दिक बधाई आदरणीय मनन कुमार सिंह साहिब। इसके विपरित भाव लिए भी समस्याओं पर केंद्रित सकारात्मक संदेश वाहक रचना भी कही जा सकती है।

Comment by Manan Kumar singh on March 8, 2018 at 10:15pm

आदरणीय समर जी,आदाब एवं शुक्रिया।

Comment by Manan Kumar singh on March 8, 2018 at 10:14pm

आपका आभार आदरणीय बृजेश जी।

Comment by Samar kabeer on March 8, 2018 at 10:06pm

जनाब मनन कुमार सिंह जी आदाब,बहुत उम्दा लघुकथा,बधाई स्वीकार करें इस प्रस्तुति पर ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 8, 2018 at 7:29pm

सत्य का अच्छा चित्रण किया है आदरणीय..

Comment by somesh kumar on March 8, 2018 at 4:19pm

KYA KISI BHI KTHAN YA GHATNA KO LGHUKTHA KHNA SHI HAI.MERE VICHAR SE LGHUKTHA GDHY KA DOHA HOTA HAI.KM SE KM SHBDON ME KOI GAMBHIR BAAT YA SNDESH DENE VALI RCHNA

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