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प्रसंग था 'दशा और 'बोध ' किसे कहते हैं ? जिज्ञासु और दार्शनिक के बीच इस विषय को लेकर काफी वाद-विवाद चला । जिज्ञासु दार्शनिक के तर्कों से संतुष्ट नहीं हो रहा था । अंत में दार्शनिक ने जो सांकेतिक जवाब दिया उसे सुनकर जिज्ञासु अभिभूत हो गया । दार्शनिक ने उंगली से चींटियों के जाते हुए झुण्ड की ओर इशारा कर दिया ।

मौलिक एवं अप्रकाशित ।

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Comment by Mohammed Arif on April 24, 2018 at 5:41am

आपकी प्रतिक्रिया ने सफल लघुकथा होने की मोहर लगा दी । दिली आभार आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी ।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on April 24, 2018 at 3:01am

 वाह। आदाब। बेहतरीन प्रतीकात्मक बोधात्मक सृजन के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद मुहतरम जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहिब। मुझे ऐसा भी लगा कि अंतिम दोनों वाक्यों को मिला कर एक वाक्य कहा जा सकता है! सादर

Comment by Mohammed Arif on April 23, 2018 at 5:44pm

अपनी अमूल्य प्रतिक्रिया से लघुकथा को सफल बनाने का हार्दिक आभार आदरणीय श्याम नारायण जी ।

Comment by Mohammed Arif on April 23, 2018 at 5:42pm

अपनी अमूल्य प्रतिक्रिया से लघुकथा को सफल बनाने का हार्दिक आभार आदरणीय तेजवीर सिंह जी ।

Comment by TEJ VEER SINGH on April 23, 2018 at 2:01pm

हार्दिक बधाई आदरणीय मोहम्मद आरिफ़ जी।बेहतरीन प्रस्तुति।

Comment by Shyam Narain Verma on April 23, 2018 at 12:27pm
सुन्दर लघु कथा के लिये बधाई ।

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