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ग़ज़ल कहते हैं क्यों लोग सताने आया हूँ

22 22 22 22 22 2

जुल्म नहीं मैं उन पर ढाने आया हूँ ।
कहते हैं क्यों लोग सताने आया हूँ ।।1

तिश्ना लब को हक़ मिलता है पीने का ।
मै बस अपनी प्यास बुझाने आया हूँ ।।2

हंगामा क्यों बरपा है मैखाने में ।
मैं तो सारा दाम चुकाने आया. हूँ ।।3

उनसे कह दो वक्त वस्ल का आया है ।
आज हरम में रात बिताने आया हूँ ।।4

है मुझ पर इल्जाम जमाने का यारों ।
मैं तो उसकी नींद चुराने आया हूँ ।।5

फितरत तेरी थी तूने दिल तोड़ दिया ।
लेकिन मैं तो प्यार निभाने आया हूँ ।।6

मुझसे मेरा हाल न पूछो ऐ जानां।
मैं तुझमे अहसास जगाने आया हूँ ।।7

हिज्र में कितनी चोट मिली है इस दिल को ।
आज तुझे हर जख्म दिखाने आया हूँ ।।8

दीवानों की रात गुजरती है कैसे ।
मैं तुमको वह हाल सुनाने आया हूँ ।।9

मैं ग़ज़लों से मोती चुनकर रखता था ।
आज तुम्हे इक शेर सुनाने आया हूँ ।।10

आवारा बादल कहते हैं लोग मुझे ।
फिर भी उनकी प्यास बुझाने आया हूँ ।।11

-- नवीन मणि त्रिपाठी

मौलिक अप्रकाशित

Views: 535

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 14, 2018 at 1:06pm

आ. भाई नवीन जी, अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on May 12, 2018 at 11:27am

आ0 श्याम नारायण वर्मा जी सादर आभार

Comment by Naveen Mani Tripathi on May 12, 2018 at 11:26am

आ0 तेजवीर सिंह जी सादर आभार

Comment by Naveen Mani Tripathi on May 12, 2018 at 11:25am

आ0 कबीर सर सादर आभार

Comment by Shyam Narain Verma on May 11, 2018 at 2:55pm
इस शानदार ग़ज़ल के लिए दिल से बधाईयाँ 
Comment by Samar kabeer on May 11, 2018 at 2:19pm

जनाब नवीन जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

7वें शैर में शुतरगुर्बा है, देखियेगा ।

Comment by TEJ VEER SINGH on May 11, 2018 at 1:03pm

हार्दिक बधाई आदरणीय नवीन मणि जी।बेहतरीन गज़ल।

दीवानों की रात गुजरती है कैसे ।
मैं तुमको वह हाल सुनाने आया हूँ ।।9

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