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जरूरत नहीं अब तेरी रहमतों की ।

हमें भी पता है डगर मंजिलों की ।।

है फ़ितरत हमारी बुलन्दी पे जाना ।

बहुत नींव गहरी यहाँ हौसलों की ।।

अदालत में अर्जी लगी थी हमारी ।

मग़र खो गयी इल्तिज़ा फैसलों की ।।

भटकती रहीं ख़्वाहिशें उम्र भर तक ।

दुआ कुछ रही इस तरह रहबरों की ।।

उन्हें जब हरम से मुहब्बत हुई तो ।

सदाएं बुलाती रहीं घुघरुओं की ।।

न उम्मीद रखिये वो गम बाँट लेंगे ।

यहाँ फ़िक्र किसको रही आंसुओं की ।।

चुनौती अंधेरों से जब भी मिली तो ।

लगी कीमती रौशनी जुगनुओं की ।।

नदारद तबस्सुम है चेहरों से सबके ।

है तादात लम्बी यहां गमजदों की ।।

कहीं खो गयी आज इंसानियत फिर।

खबर ही नहीं आदमी को हदों की ।।

बिछे हैं यहां दागियों की डगर में ।

ये ख्वाहिश नहीं थी चमन के गुलों की ।।

नवीन मणि त्रिपाठी

मौलिक अप्रकाशित 

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 8, 2018 at 7:30pm

आ. भाई नवीन जी, सुंदर गजल हुयी है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Mahendra Kumar on June 8, 2018 at 11:48am

बढ़िया ग़ज़ल है आदरणीय नवीन मणि जी. हार्दिक बधाई प्रेषित है. सादर.

Comment by TEJ VEER SINGH on June 8, 2018 at 10:47am

हार्दिक बधाई आदरणीय नवीन मणि जी।बेहतरीन गज़ल।

कहीं खो गयी आज इंसानियत फिर।

खबर ही नहीं आदमी को हदों की ।।

Comment by gumnaam pithoragarhi on June 8, 2018 at 9:34am
वाह बहुत खूब ग़ज़ल काफी अच्छी लगी ,,,, बधाई

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