For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

जलियांवाला बाग़ (लघुकथा)

‘‘फ़ायर!’’ जनरल के कहते ही सैकड़ों बन्दूकें गरजने लगीं। उस जंगल में आदिवासी चारों तरफ़ से घिर चुके थे। उनकी लाशें ऐसे गिर रही थीं जैसे ताश के पत्ते। क्या बच्चे, क्या बूढ़े, क्या जवान, कोई भी ऐसा नहीं नहीं था जो बच सका हो। कुछ ने पेड़ों के पीछे छिपने की कोशिश की तो कुछ ने पोखर के अन्दर मगर बचा कोई भी नहीं। देखते ही देखते हरा-भरा जंगल लाल हो गया।

‘‘आगे बढ़ो!’’ जनरल ने आदेश दिया। सेना लाशों के बीच से होते हुए जंगल के भीतर बढ़ने लगी। वहाँ कोई भी ज़िन्दा नज़र नहीं आ रहा था सिवाय उस छोटी सी बच्ची के जो अपनी मरी हुई माँ का दूध पी रही थी। ‘‘अब ये जी कर क्या करेगी?’’ जनरल ने उसे गोली मारी और आगे बढ़ गया।

अन्दर आदिवासियों का एक बहुत बड़ा गाँव था। सेना अपनी पोजीशन ले चुकी थी। जनरल का आदेश मिलते ही सैनिकों ने ज़ोरदार हमला बोला। थोड़ी ही देर में उस बस्ती का नामोनिशान मिट गया। ‘‘आॅपरेशन पूरा हुआ।’’ जनरल ने धूँ-धूँ कर जलते हुए जंगल के बीच से अपने सीनियर को सूचना दी। ‘‘शाबाश उधम सिंह!’’ उधर से आवाज़ आयी। ‘‘सरकार तुम्हारे काम से बहुत ख़ुश है। वो तुम्हें लन्दन में फ्लैट दे कर सम्मानित करना चाहती है। बधाई हो!’’

ठीक इसी वक़्त देश के अन्दर एक शहर की बड़ी सी कोठी के भीतर। ‘‘ये लो हथियार। आज रात विधर्मियों को छोड़ना नहीं है।’’ भगत सिंह ने अपने साथियों को हथियार देते हुए कहा। सबने डाॅक्टर सत्यपाल के पैर छुए, उनसे आशीर्वाद लिया और कोठी से बाहर चले गये। कुछ ऐसा ही नज़ारा सैफ़ुद्दीन किचलू के घर भी था। हथियार वहाँ भी बांटे जा रहे थे।

बाहर मौसम बहुत ख़राब था। आंधी के साथ तेज़ बारिश भी हो रही थी। सड़क पर जर्जर मकान की दीवार से सटकर एक भिखारी खड़ा था जो चुपचाप यह सब देख रहा था। उसने बारिश से बचने के लिए एक टूटी हुई तस्वीर से अपना सर ढक रखा था। तस्वीर भारत माता की थी। अब उनके शरीर पर कोई ज़ंजीर नहीं थी। भारत माता आज़ाद थीं पर उनकी ज़ंजीर अब भगत और उधम सिंह जैसे नौजवानों को जकड़ चुकी थी।

(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 373

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on August 6, 2018 at 9:50pm

उत्तम कथा, हार्दिक बधाई

Comment by Mahendra Kumar on June 26, 2018 at 11:04am

नमस्कार आदरणीया रक्षिता जी। लघुकथा पसन्द करने के लिए आपका हृदय से आभारी हूँ। बहुत-बहुत धन्यवाद। सादर।

Comment by Mahendra Kumar on June 26, 2018 at 11:03am

आपकी समीक्षात्मक टिप्पणी के हृदय से आभारी हूँ आदरणीय शेख़ शहज़ाद उस्मानी जी। देखता हूँ क्या बेहतर कर सकता हूँ। बहुत-बहुत धन्यवाद। सादर। 

Comment by Mahendra Kumar on June 26, 2018 at 11:00am

बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीय लक्ष्मण धामी जी। हार्दिक आभार। सादर। 

Comment by Mahendra Kumar on June 26, 2018 at 10:59am

नमस्कार आदरणीया नीलम जी। लघुकथा पसन्द करने के लिए आपका हृदय से आभारी हूँ। बहुत-बहुत धन्यवाद। सादर। 

Comment by Mahendra Kumar on June 26, 2018 at 10:57am

धन्यवाद आदरणीय श्याम नारायण जी। हार्दिक आभार। सादर। 

Comment by Rakshita Singh on June 15, 2018 at 2:50pm

आदरणीय महेन्द्र जी नमस्कार,

लघुकथा पढते पढते आखों में उस समय के चलचित्र दौड़ पड़े....बहुत ही सुन्दर लघुकथा ।

हार्दिक बधाई स्वीकार  करें ।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on June 15, 2018 at 6:03am

आपकी कलम व परिकल्पना से एक और उम्दा सृजन। हार्दिक बधाई आदरणीय महेंद्र कुमार साहिब। दरअसल जिन पाठकगण को इस ऐतिहासिक घटना के पात्रों के बारे में आवश्यक जानकारी नहीं है, वे कुछ असहजता महसूस कर सकते हैं रुचि लेने में, जबकि कुछ  जानकार पाठकगण ऐसे विषयों में बहुत रुचि लेते हैं। रचना के अनुसार बढ़िया शीर्षक, लेकिन भाव अनुसार कोई संवेदनशील शीर्षक भी सोचा जा सकता है और 'जलियांवाला बाग़' स्थान नाम रचना में कहीं शामिल किया जा सकता है मेरे विचार से। सादर।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 14, 2018 at 4:25pm

आ. भाई महेंद्र जी, बेहतरीन कथा हुयी है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Neelam Upadhyaya on June 14, 2018 at 12:50pm

आदरणीय महेंद्र कुमार जी, नमस्कार । बहुत ही अच्छी लघुकथा हुयी है । हार्दिक बधाई ।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Md. Anis arman replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
"जी सर सुधार कर लेता हूँ बहुत बहुत शुक्रिया, सर एक शंका थी "गीत ग़म का तूने ही "करने से…"
19 seconds ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
"आ. भाई दण्डपाणि जी, अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।"
4 minutes ago
Md. Anis arman replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
"सर कहां चूक हो गई मुझसे? "
7 minutes ago
Samar kabeer replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
"जनाब दण्डपाणि 'नाहक़' जी आदाब, तरही मिसरे पर ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।"
33 minutes ago
Samar kabeer replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
"कृपया नाम से पहले आदर सूचक शब्दों का प्रयोग करें ।"
37 minutes ago
Samar kabeer replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
""गीत तूने ग़म का ही  हमको सुनाया उम्रभर  ज़िन्दगी तुझको हसीं नग़्मा समझ बैठे थे…"
39 minutes ago
Samar kabeer replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
"दुष्यंत मुस्तनद शाइर नहीं है,ऐसी बेशुमार ग़लतियाँ उसके कलाम में पाई जाती हैं,और नए साहित्यकार उसी को…"
47 minutes ago
Md. Anis arman replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
"अजय गुप्ता जी बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है आपने बहुत बहुत बधाई "
55 minutes ago
Md. Anis arman replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
"समर कबीर साहब ग़ज़ल तक आने और इस्लाह का बहुत बहुत शुक्रिया, फिर "लफ़्ज़ को दो बार मैने जानकर एक…"
57 minutes ago
रवि भसीन 'शाहिद' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
"जी समर साहब, बहुत बेहतर। सर, एक शेर बता रहा हूँ जिसे पढ़ कर मैंने शम्अ का वज़न 22 सही समझ लिया। ये…"
1 hour ago
Md. Anis arman replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
"नाहक जी ग़ज़ल तक आने और पसंद करने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया "
1 hour ago
Md. Anis arman replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
"रवी भसीन जी ग़ज़ल तक आने और पसंद करने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया "
1 hour ago

© 2020   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service