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'आदी की चादर' (छंदमुक्त, अतुकांत कविता)

मां, गुजराती चादर दे दे!
मैं 'फ़ादर' सा बन जाऊं!
जनता अपने राष्ट्र की
स्वामियों, बापुओं सा आदर दे दे!
अंग्रेज़ों सा व्यापारी बन कर,
तोड़ूं-फोड़ूं और मारूं-काटूं
विदेशी सूट पहन इतराऊं!
मां किसी 'गांधी' सी 'चादर' ओढ़ाकर
तस्वीरें, मूर्तियाँ मेरी सजवादे
मैं भी जिंदा लीजेंड, किंवदंती कहलाऊं!
मुग़ल, अंग्रेज़, हिटलर, कट्टर
सब से शिक्षायें ले लेकर
आतंक कर आतंकी न कहलाऊं !
मां 'धर्म' की बरसाती दे दे
बदनामियों सा न भीग जाऊं!
मां गुजराती चादर दे दे
'व्यापारों' के 'चरखे' चलवाऊं!
एक और 'गुजराती बाबू' कहलाऊं!
बापू को नोटों से भगवाकर
सबको भगवा-रंगवाकर
वोटों-नोटों पर छा जाऊं!
'मां' तुमसे भी दूर रह-रहकर
देश-विदेश घूम-घूम कर
अद्भुत सेवक, भक्त, लाड़ला कहलाऊं!
आदतों से ही नाम कमाकर
सुभाषण-कुभाषण दे देकर
नेता-अभिनेता, कलाकार सब कुछ बनकर
मोम की मूर्तियों में ढलकर
हर घर-मंदिर में छा जाऊं!
मां 'स्वधर्म' की चादर दे दे
'सेवकों' की 'रेबड़ियां' बटवाऊं!
रामराज्य की परिकल्पना दे देकर

विदेशों से कुछ ले-देकर
द्रोहियों को, दुश्मनों को भगवाऊं!
मां मुझको भी वैसी चादर दे दे
महान हस्तियों को भुलवाकर
इतिहास बदल-बदलवाकर
सारी दुनिया में केेेवल मैं महानतम हो जाऊं! 


(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on March 13, 2019 at 3:07pm

मेरी रचना का अवलोकन करने वाले आज तक के सभी पाठकगण व व्यूअर्स को हार्दिक धन्यवाद इस हौसला अफ़ज़ाई हेतु।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on August 18, 2018 at 10:45am

रचना पर समय देकर अनुमोदन और प्रोत्साहित करने हेतु सादर हार्दिक धन्यवाद आदरणीया बबीता गुप्ता  साहिबा।

Comment by babitagupta on August 15, 2018 at 4:24pm

तीखा प्रहार करती पंक्तियाँ ,बेहतरीन रचना के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार कीजियेगा आदरणीय सरजी।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on August 9, 2018 at 5:38pm

कृपया 15 वीं पंक्ति के आरंभ का संशोधित रूप पढ़िएगा :

// बदनामियों सा // = //बदनामियों से// 

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on August 9, 2018 at 5:38pm

त्वरित टिप्पणियों द्वारा अनुमोदन और विचार साझा करने हेतु और पुनः स्नेहिल हौसला अफ़ज़ाई के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरम जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहिब , मुहतरमा नीलम उपाध्याय साहिबा और मुहतरम जनाब समर कबीर साहिब।

 कृपया 15 वीं पंक्ति के आरंभ का संशोधित रूप पढ़िएगा :

// बदनामियों सा // = //बदनामियों से// 

Comment by Samar kabeer on August 9, 2018 at 4:05pm

जनाब शैख़ शहज़ाद उस्मानी जी आदाब,"माँ खादी की चादर देदे, मैं गाँधी बन जाऊँ"

इन पंक्तियों से इस्तिफ़ादा करते हुए,अच्छी कविता लिखी आपने, इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Neelam Upadhyaya on August 9, 2018 at 3:45pm

आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी, नमस्कार । बहुत ही उपयुक्त कटाक्षपूर्ण  रचना के लिए हार्दिक बधाई।

Comment by Mohammed Arif on August 9, 2018 at 10:20am

आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी आदाब,

                                          बहुत ही कटाक्षपूर्ण और विचारोत्तेजक कविता । इशारों ही इशारों में सबकुछ कह दिया और समझने वाले समझ गए होंगे । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

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