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1222 1222 1222 1222 

बड़ी उम्मीद थी उनसे वतन को शाद रक्खेंगे ।
खबर क्या थी चमन में वो सितम आबाद रक्खेंगे ।।

है पापी पेट से रिश्ता पकौड़े बेच लेंगे हम।
मगर गद्दारियाँ तेरी हमेशा याद रक्खेंगे ।।

हमारी पीठ पर ख़ंजर चलाकर आप तो साहब ।
नये जुमले से नफ़रत की नई बुनियाद रक्खेंगे ।।

विधेयक शाहबानो सा दिये हैं फख्र से तोहफा ।
लगाकर आग वो कायम यहां उन्माद रक्खेंगे ।।

इलक्शन आ रहा है दाल गल जाए न फिर उनकी।
तरीका हम भी अपने वास्ते ईज़ाद रक्खेंगे ।।

बहुत अब हो चुका हिन्दू मुसलमां का यहाँ नाटक ।
तुम्हारी ख्वाहिशों को हम तो मुर्दाबाद रक्खेंगे ।।

मिटा देने की जुर्रत आपने बेशक़ किया साहब ।
सवर्णो की ख़ुशी को लोग जिंदाबाद रक्खेंगे ।।

ये हिंदुस्तान है प्यारे पता है असलियत सबकी ।
कहाँ पर वोट की घटती हुई तादाद रक्खेंगे ।।

अभी तो वक्त है कर लें तमन्ना जुल्म की पूरी ।
नहीं हम आपसे कोई कभी फ़रियाद रक्खेंगे ।।

मिली सत्ता थी इस खातिर मिटेगा जातिवादी विष ।
भला जनता से कैसे आप अब सम्वाद रक्खेंगे ।।

निजी हाथों में भारत का मुकद्दर बेच डाला है ।
बचाकर रोजियां कितनी यहां उस्ताद रक्खेंगे ।।


नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

Views: 564

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Comment by narendrasinh chauhan on August 17, 2018 at 4:15pm
सुन्दर रचना
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 16, 2018 at 6:54am

बेहतरीन गजल के लिए ढेरों हार्दिक बधाई ...

Comment by नादिर ख़ान on August 15, 2018 at 7:59pm

बड़ी उम्मीद थी उनसे वतन को शाद रक्खेंगे ।
खबर क्या थी चमन में वो सितम आबाद रक्खेंगे ।।

है पापी पेट से रिश्ता पकौड़े बेच लेंगे हम।
मगर गद्दारियाँ तेरी हमेशा याद रक्खेंगे ।।..... उम्दा अशआर आदरणीय नवीन मणि जी ....

सम्वाद  को संवाद  कर लीजिये 

Comment by Samar kabeer on August 15, 2018 at 7:56pm

5,6,और 8 नम्बर के अशआर पर ग़ौर करें ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on August 15, 2018 at 7:09pm

आ0 कबीर सर सादर नमन । मुझे लगता है नीचे से तीन शेर की ओर आपका इशारा है । देखता हूँ ।

Comment by babitagupta on August 15, 2018 at 3:24pm

वतनपरस्ती का जज्बा बयान करती पंक्तियाँ ,बेहतरीन रचना के लिए हार्दिक   बधाई स्वीकार कीयेगा आदरणीय सरजी।

Comment by Samar kabeer on August 15, 2018 at 2:46pm

जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है बधाई स्वीकार करें ।

कुछ अशआर में रदीफ़ और क़ाफ़िये का तालमेल नहीं,यानी रदीफ़ से इंसाफ़ नहीं हो पाया है,देखियेगा ।

Comment by TEJ VEER SINGH on August 15, 2018 at 10:25am

हार्दिक बधाई आदरणीय नवीन मणि जी।बेहतरीन समसामयिक गज़ल। मौजूदा हालात पर बढ़िया कटाक्ष।

है पापी पेट से रिश्ता पकौड़े बेच लेंगे हम।
मगर गद्दारियाँ तेरी हमेशा याद रक्खेंगे ।।

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