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ग़ज़ल (तोड़ते भी नहीं यारी को निभाते भी नहीं)

(फा इलातुन _फइलातुन _फइलातुन_फेलुन)

तोड़ते भी नहीं यारी को निभाते भी नहीं l 
शीशए दिल में है क्या मुझको बताते भी नहीं l

ऐसे दीवाने भी हम दम हैं जो उलफत के लिए
गिड़ गिड़ाते भी नहीं सर को झुकाते भी नहीं l

मांगता जब भी हूँ मैं उनसे जवाबे उलफत
ना भी करते नहीं हाँ होटों पे लाते भी नहीं l

उनकी उलफत का यकीं कोई भला कैसे करे
वो मिलाते भी नहीं आँख चुराते भी नहीं l

हक़ गरीबों का जो बिन मांगे तू देता ज़ालिम
ये मुखालिफ तेरे आवाज़ उठाते भी नहीं l

किस तरह आगे बढ़े दरमियाँ भाई चारा
वो गले लगते नहीं मुझको लगाते भी नहीं l

उस दगा बाज़ की फितरत से जो वाक़िफ होते
दिल भी हम देते नहीं जान लुटाते भी नहीं l

उनको पैगामे वफ़ा कैसे भला दे कोई
रुख बदलते वो नहीं आँख लड़ाते भी नहीं l

जानते हम जो नहीं शौक़े सुखन गोई उन्हें
उनको तस्दीक ग़ज़ल अपनी सुनाते भी नहीं l

(मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Tasdiq Ahmed Khan on August 22, 2018 at 7:08pm

जनाब नवीन साहिब, ग़ज़ल पर आपकी सुंदर प्रतिक्रिया और हौसला अफज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया I 

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on August 22, 2018 at 7:08pm

जनाब भाई पंकज कुमार साहिब , ग़ज़ल पर आपकी सुंदर प्रतिक्रिया और हौसला अफज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया I 

Comment by Naveen Mani Tripathi on August 22, 2018 at 1:42pm

सम्भवतः यह तरही मिसरा पर ग़ज़ल लिखी गयी है जो समय से पूर्व ही पटल पर प्रकाशित हो गयी ।

   बहुत अच्छे शेर कहे हैं आपने । अच्छी ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई ।

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 22, 2018 at 11:52am

एक अच्छी ग़ज़ल से मंच को उपलब्ध कराने के लिए हार्दिक आभार सर

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on August 22, 2018 at 11:43am

जनाब अजय साहिब, ग़ज़ल पर आपकीखूबसूरत प्रतिक्रिया और हौसला अफज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया I  

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on August 22, 2018 at 11:42am

जनाब भाई लक्ष्मण धा मी साहिब  , ग़ज़ल पसंद करने और आपकी हौसला अफज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया I 

Comment by Ajay Tiwari on August 22, 2018 at 8:09am

आदरणीय तस्दीक साहब, खुबसूरत ग़ज़ल हुई है. हार्दिक बधाई. 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 21, 2018 at 7:25pm

आ. भाई तस्दीक अहमद जी, सादर अभिवादन ।बेहतरीन गजल के लिए हार्दिक बधाई ।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on August 21, 2018 at 11:05am

जनाब बसंत कुमार साहिब   , ग़ज़ल पसंद करने और आपकी हौसला अफज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया I 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on August 21, 2018 at 9:50am

वाह क्या कहने, लाजबाब अशआर आपके आनंद आ गया आदरणीय 

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