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मंजिल की पहली सीढ़ी--लघुकथा

एक बार फिर वह बुझे मन से उस अर्धनिर्मित क्लास रूम की तरफ निकाल पड़ी जहाँ पिछले दो महीने से वह बच्चों को पढ़ा रही थी. बच्चों को पढ़ाना उसका शौक था और इसके पहले भी वह जहाँ भी रही, उसने यह काम हमेशा किया. लेकिन हमेशा बच्चे उसके घर पढ़ने आते थे और ठीक ठाक घरों के होते थे.

उस मलिन बस्ती में, जहाँ बच्चों की कक्षा चलती थी, जाने में शुरुआत में तो उसकी हालत खराब हो गयी थी. चारो तरफ गंदगी, रास्ते के किनारे बहता हुआ खुला नाबदान और खस्ताहाल दो कमरे, जिसमें बच्चे चटाई पर बैठकर पढ़ते थे. हालाँकि धीरे धीरे बच्चों में सफाई और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता आ रही थी लेकिन उसकी उम्मीद से बहुत धीरे. लेकिन सबसे ज्यादा जो चीज उसे साल रही थी, वह थी बच्चों और उनके माता पिता का सिर्फ नाम के लिए वहाँ आना. अक्सर कुछ लोग वहाँ बच्चों के लिए बैग, किताबें इत्यादि बांटने आते थे और काफी बच्चे सिर्फ उसी के लिए वहाँ आते थे.

“बहुत मुश्किल लग रहा है यहाँ बच्चों को पढ़ा पाना, एक तो जगह इतनी खराब और दूसरे पढ़ने वाले बच्चे ही नहीं हैं”, उसने शिकायती लहजे में एक दिन कहा.

“थोड़ा इंतज़ार करना पड़ेगा, किसी समाज में घुसकर उनका विश्वास जीतना आसान नहीं होता. जल्द ही परिणाम दिखाई देगा, मुझे तुम पर पूरा भरोसा है”, पति ने दिलासा दिया.

यही सब सोचती आज फिर वह बस्ती में पहुंची और थोड़ी देर में ही काफी बच्चे आ गए. उसने पूरी तल्लीनता से उन्हें पढ़ाना शुरू किया और तभी एक आवाज़ उसके कान में पड़ी “मैम, मुझे मैथ अलग से पढ़ा दीजिएगा, स्कूल में ठीक से नहीं समझाते हैं”.

उसने उस बच्ची की तरफ देखा और मुस्कुराकर उसका सर सहला दिया. अपनी मंजिल की पहली सीढ़ी उसे दिखाई देने लगी, अब बच्चों का शोर उसे परेशान नहीं कर रहा था.      

मौलिक एवम अप्रकाशित  

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Comment by babitagupta on September 5, 2018 at 6:31pm

अपने अध्यापन कार्य को सही अंजाम मिलना,समाज को शिक्षा के प्रति जागरूकता का संदेश देती बेहतरीन रचना।हार्दिक  स्वीकार कीजियेगा आदरणीय विनय सरजी।

Comment by विनय कुमार on September 5, 2018 at 3:37pm

बहुत बहुत आभार आ मुहतरम समर कबीर साहब

Comment by विनय कुमार on September 5, 2018 at 3:36pm

बहुत बहुत आभार आ तेज वीर सिंह जी

Comment by Samar kabeer on September 2, 2018 at 2:27pm

जनाब विनय कुमार जी आदाब,अच्छी लघुकथा लिखी आपने, इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by TEJ VEER SINGH on September 2, 2018 at 1:50pm

हार्दिक बधाई आदरणीय विनय कुमार जी।शिक्षा के प्रति जागरूकता का आवाहन करती बेहतरीन लघुकथा।

Comment by विनय कुमार on September 2, 2018 at 9:22am

बहुत बहुत शुक्रिया आ शेख शहजाद उस्मानी साहब

Comment by विनय कुमार on September 2, 2018 at 9:22am

बहुत बहुत शुक्रिया आ मिर्जा जावेद बेग साहब

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on September 2, 2018 at 1:24am

 सच और उम्मीदों की कशमकश पर बढ़िया रचना हार्दिक बधाई आदरणीय  विनय कुमार साहिब। शायद संपादन/कसावट के लिए समय नहीं दिया जा सका है। सादर।

Comment by mirza javed baig on September 1, 2018 at 7:53pm

 जनाब विनयय कुमार साहिब आदाब

लघू कथा पढने की शुरूआत आपकी लघूकथा से की हे ।

पहला अनुभव था मेरे लिए ।

मुझे बहुत ही मुतास्सिर किया इस लघू कथा ने ।

तहे दिल से मुबारकबाद पैश करता हूं ।

स 

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