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कुछ क्षणिकाएं :

कुछ क्षणिकाएं :

पिघलती नहीं
अब
अंतर्मन की व्याकुलता
आँखों से
स्वार्थ का चश्मा
सोख लेता है
सारा दर्द

................

सीख लिया है
आँखों ने
खारा पानी पीना
संवेदनहीन

हो गया है
वर्तमान

.........................

झीलें नहीं होती
भावों की
आँखों में
मैच कर लेता है
हर अंतरंग का रंग
कांटेक्ट लेंस

.....................

मुद्दत हो गई
खुद से मुलाकात हुए
शायद
उनसे बिछुड़ने का
अंजाम है ये
पलक से गिरा
लकीरों पे
किसी याद का
मुकाम है ये

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on October 2, 2018 at 2:38pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार। 

Comment by Sushil Sarna on October 2, 2018 at 2:37pm

आदरणीया  babitagupta जी सृजन आपकी ऊर्जावान प्रतिक्रिया का आभारी है।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 29, 2018 at 1:20pm

आ. भाई सुशील जी, बेहतरीन क्षणिकाएँ हुई हैं । हार्दिक बधाई ।

Comment by babitagupta on September 29, 2018 at 1:02pm

क्षणिकाओं  के माध्यम से मानवीय सम्बेदनाओं को प्राकृतिक चीजों द्वारा बताना,बेहतरीन रचना,हार्दिक बधाई स्वीकार कीजियेगा आदरणीय सुशिल सरजी। 

Comment by Sushil Sarna on September 27, 2018 at 6:41pm

आदरणीय विजय निकोर जी , सादर प्रणाम , प्रस्तुति पर आपकी मन मुदित करती प्रशंसा का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on September 27, 2018 at 6:41pm

आदरणीय डॉ छोटेलाल सिंह जी सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on September 27, 2018 at 6:41pm

आदरणीय सुरेन्दर नाथ सिंह जी सृजन पर आपकी आत्मीय प्रशंसा का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on September 27, 2018 at 6:40pm

आदरणीय समर कबीर साहिब , आदाब ... सृजन पर आपकी आत्मीय प्रशंसा एवं सूक्ष्म त्रुटि की ओर ध्यान दिलाने का दिल से आभार। मैं अभी एडिट करता हूँ सर. हार्दिक आभार।

Comment by Sushil Sarna on September 27, 2018 at 6:40pm

आदरणीय नरेंद्र चौहान जी सृजन को मान देने का दिल से शुक्रिया।

Comment by Sushil Sarna on September 27, 2018 at 6:40pm

आदरणीया राजेश कुमारी जी सृजन आपकी ऊर्जावान प्रतिक्रिया का आभारी है।

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