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खिजा के दौर में जीना मुहाल कर तो सही ।
मेरी वफ़ा पे तू कोई सवाल कर तो सही ।।

है इंतकाम की हसरत अगर जिग़र में तेरे ।
हटा नकाब फ़िज़ा में जमाल कर तो सही ।।

निकल गया है तेरा चाँद देख छत पे ज़रा ।
तू जश्ने ईद में मुझको हलाल कर तो सही ।।

बिखरता जाएगा वो टूट कर शजर से यहां ।
निगाह से तू ख़लिस की मज़ाल कर तो सही ।।

मिलेंगे और भी आशिक तेरे जहां में अभी ।
तू अपने हुस्न की कुछ देखभाल कर तो सही ।।

ऐ अब्र दम है तो सावन सा इस जमीं पे बरस ।
तपिस में जलते गुलों को निहाल कर तो सही ।।

यहां तो कुर्सियां मिलती हैं कातिलों को सनम ।
मुसलमां हिन्दू में दंगा- बवाल कर तो सही ।।

तुझे खुदा भी मैं शिद्दत से मान जाऊं मगर ।
सियाह रात है कोई कमाल कर तो सही ।।

तिज़ारतों का असर है मुहब्बतों पे बहुत ।
तू अपने भाव में थोड़ा उछाल कर तो सही ।।

ज़माना लौट भी सकता है हसरतों के लिए ।
ऐ हुक्मरान सितम पर मलाल कर तो सही ।।

गली से निकला है तू फिर से अजनबी की तरह ।
मेरे अज़ीज़ मेरा भी खयाल कर तो सही ।।

मौलिक अप्रकाशित
नवीन मणि त्रिपाठी

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Comment by TEJ VEER SINGH on October 22, 2018 at 11:38am

हार्दिक बधाई आदरणीय नवीन मणि जी।बेहतरीन गज़ल।

ज़माना लौट भी सकता है हसरतों के लिए ।
ऐ हुक्मरान सितम पर मलाल कर तो सही ।।

Comment by narendrasinh chauhan on October 19, 2018 at 2:46pm

खूब सुंदर गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on October 18, 2018 at 11:33pm

आ0 लक्ष्मण धामी साहब सादर आभार ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on October 18, 2018 at 11:32pm

आ0 कबीर सर सादर नमन के साथ तहेदिल से शुक्रिया सर । आपके आदेश का अविलम्ब पालन होगा । सादर नमन ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 18, 2018 at 10:31pm

आ. भाई नवीन जी, अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Samar kabeer on October 18, 2018 at 10:25pm

जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।

4थे शैर के सानी में 'खलिस' को "ख़लिश" कर लें ।

छटे शैर के सानी में 'तपिस' को "तपिश" कर लें ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on October 17, 2018 at 3:57pm

आ0 कबीर सर की महत्व पूर्ण इस्लाह का आकांक्षी ।

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