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ग़ज़ल नूर की- सँभाले थे तूफ़ाँ उमड़ते हुए

सँभाले थे तूफ़ाँ उमड़ते हुए
मुहब्बत से अपनी बिछड़ते हुए.
.
समुन्दर नमाज़ी लगे है कोई
जबीं साहिलों पे रगड़ते हुए.
.
हिमालय सा मानों कोई बोझ है
लगा शर्म से मुझ को गड़ते हुए.
.
“हर इक साँस ने”; उन से कहना ज़रूर  
उन्हें ही पुकारा उखड़ते हुए.  
.
हराना ज़माने को मुश्किल न था  
मगर ख़ुद से हारा मैं लड़ते  हुए.
.
ज़रा देर को शम्स डूबा जो “नूर”
मिले मुझ को जुगनू अकड़ते हुए.
.
निलेश "नूर"
मौलिक/ अप्रकाशित  

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Comment by Mahendra Kumar on January 16, 2019 at 4:44pm

ख़ूबसूरत ग़ज़ल है आदरणीय नीलेश जी। हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए। सादर।

Comment by PHOOL SINGH on December 13, 2018 at 2:53pm

वाह-वाह क्या बात है बहुत ही सूंदर ग़ज़ल, बधाई स्वीकारें

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on November 11, 2018 at 5:20pm

आद0 नीलेश भाई जी सादर अभिवादन। बढिया ग़ज़ल कही आपने,,बधाई स्वीकार कीजिये

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on November 8, 2018 at 5:43pm

आदरणीय नीलेश भाई जी, उम्दा अशआर निकले हैं। दिली मुबारकबाद

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 31, 2018 at 2:38pm

शुक्रिया आ. बृजेश जी 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 31, 2018 at 12:37pm

हर इक साँस ने”; उन से कहना ज़रूर
उन्हें ही पुकारा उखड़ते हुए...वाह क्या खूब कहा आदरणीय..बहुतखूब ग़ज़ल

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 29, 2018 at 12:03pm

शुक्रिया आ. सुरखाब भाई 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 29, 2018 at 12:03pm

शुक्रिया आ. तेजवीर सिंह जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 29, 2018 at 12:03pm

शुक्रिया आ. समर सर 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 29, 2018 at 12:02pm

शुक्रिया आ. बलराम जी 

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