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ग़ज़ल नूर की- सोचिये फिर डूबने में कितनी आसानी रहे

.
सोचिये फिर डूबने में कितनी आसानी रहे
उनकी आँखों में जो मेरे वास्ते पानी रहे.
.
मैं किसी को जोड़ने में घट भी जाऊँ ग़म न हो
ज़िन्दगानी के गणित में इतनी नादानी रहे.
.
क़त्ल होते वक़्त भी मैं मुस्कुराता ही रहूँ
ताकि क़ातिल को मेरे ता-उम्र हैरानी रहे.
.
क़ाफ़िला यादों का गुज़रे रेगज़ार-ए-दिल से जब
आँखों में लाज़िम है सारी रात तुग़्यानी रहे.
.
क्यूँ भला सोचूँ वो दुश्मन है मेरा या कोई दोस्त
मैं रहूँ अव्वल तो बेशक़ कोई भी सानी रहे.
.
निलेश "नूर"
मौलिक/ अप्रकाशित 

Views: 1151

Comment

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Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on November 8, 2018 at 5:45pm

आदरणीय नीलेश भाई नमन सादर! उम्दा गजल कही है। बधाई बहुत बहुत

Comment by Nilesh Shevgaonkar on November 6, 2018 at 12:29pm

धन्यवाद आ. रवि जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on November 6, 2018 at 12:29pm

धन्यवाद आ. मोहम्मद आरिफ साहब 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on November 6, 2018 at 12:28pm

धन्यवाद आ. अजय जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on November 6, 2018 at 12:28pm

धन्यवाद आ. छोटेलाल सिंह जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on November 6, 2018 at 12:28pm

धन्यवाद आ. तेजवीर जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on November 6, 2018 at 12:28pm

शुक्रिया आ. समर सर,
बांग्लादेश से भारत आने की आपाधापी में धन्यवाद ज्ञापित करने में देरी  हुई इसका खेद है 

Comment by Ravi Shukla on November 6, 2018 at 1:19am

आदरणीय निलेश जी, उम्दा ग़ज़ल हुई है. हार्दिक बधाई.

मैं किसी को जोड़ने में घट भी जाऊँ ग़म न हो 
ज़िन्दगानी के गणित में इतनी नादानी रहे.
.

इस के लिए अलग से बधाई 

Comment by Mohammed Arif on November 4, 2018 at 8:04am

आदरणीय निलेश जी आदाब,

                   बहुत ही शानदार और धारदार ग़ज़ल । इस ग़ज़ल का हर शे'र मुझे पसंद है । दिली मुबारकबाद कुबूल करें ।

Comment by Ajay Tiwari on November 3, 2018 at 8:04pm

आदरणीय निलेश जी, उम्दा ग़ज़ल हुई है. हार्दिक बधाई.

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