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मिट गए नक़्श सभी....संतोष

फ़ाइलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फ़ेलुन/फ़इलुन

मिट गये नक़्श सभी दिल के दिखाऊँ कैसे

एक भुला हुआ क़िस्सा मैं सुनाऊँ कैसे

जा चुका है जो सभी तोड़के रिश्ते मुझसे

सोचता हूँ उसे आवाज़ लगाऊँ कैसे

अहमियत दिल की यहाँ लोग  समझते ही नहीं

उनको इस बात का अहसास दिलाऊँ कैसे

तिश्नगी उसकी बुलाती है इशारों से मुझे

मैं समन्दर की भला प्यास बुझाऊँ कैसे

प्यार का कोई तलबगार नहीं दुनिया में

इस ख़ज़ाने को मैं 'संतोष' लुटाऊँ कैसे

#संतोष_खिरवड़कर

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by Ajay Tiwari on November 17, 2018 at 4:50pm

आदरणीय संतोष जी, अच्छी ग़ज़ल हुई है. हार्दिक बधाई.

Comment by राज़ नवादवी on November 14, 2018 at 2:50pm

जनाब संतोष जी आदाब,सुन्दर ग़ज़ल के लिए दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ । सादर 

Comment by क़मर जौनपुरी on November 14, 2018 at 12:30pm
तिश्नगी उसकी बुलाती है इशारों से मुझे
मैं समन्दर की भला प्यास बुझाऊँ कैसे

वाह संतोष साहब, बहुत बेहतरीन शेर हुआ है।
पूरी ग़ज़ल बहुत अच्छी है। मुबारकबाद क़बूल करें।
Comment by Samar kabeer on November 14, 2018 at 12:09pm

जनाब संतोष जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

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