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ज़बां फूलों सी रखता है

ज़बां फूलों सी रखता है ......
अना पत्थर सी रखता है ......
अधूरी दास्तां दिल मे छिपा कर वो भी रखता है ......



वो मुझसे जब भी मिलता है, ज़िक्र मौसम का करता है ......
किसी से नाज़ उठवाने की हसरत वो भी रखता है ......
नज़र अहले - नज़र की रहती है यूं चाँद - तारों पर ......
है दिल ज़ेर-ए-गा मेरा, खबर ये वो भी रखता है ......



बहत सी धूप - छाँव उसके लहजे से झलकती है ......
कई अल्फ़ाज़ के मानी बदल कर वो भी रखता है ......
अंधेरो से निपटने का सलीक़ा हमको आता है ......
ज़रा सी रौशनी हाथों मे लाकर वो भी रखता है ........रावी (प्रभा)

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Comment by Prabha Khanna on July 3, 2011 at 12:34pm
@ Ravi sir, Aavaaz sir, Imran sir... Thankyou so much.. Aabhaar :)
Comment by Rash Bihari Ravi on July 2, 2011 at 12:20pm
khubsurat lajabab
Comment by आवाज शर्मा on July 2, 2011 at 6:33am
वाह ! खुबसूरत सेरोँ की माला । हमेँ पसन्द आई ।
Comment by इमरान खान on June 29, 2011 at 10:56am
waah ... bahut khoobsurat ... :)
Comment by Prabha Khanna on June 26, 2011 at 4:58pm
... Aabhaar mitrron ...

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 26, 2011 at 1:53pm

रचना भावना प्रधान तो है ही, बहुत मुलायम भी है, बधाई. 

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