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‘बाबू जी, ग्यारह महीने हो गए, मगर अब तक मुझे  पेंशन, बीमा, ग्रेच्युटी, अवकाश नकदीकरण कुछ भी नहीं मिला I

‘मिलेगा कैसे अभी स्वीकृत ही कहाँ हुआ ?’

‘पर काहे नहीं हुआ ? हमने तो रिटायर होने के छः माह पहले ही सारे प्रपत्र भर कर दे दिए थे I’

‘ज्यादा भोले मत बनो, तुमने भी साठ साल की उम्र तक नौकरी की है I तुम्हें  नहीं पता सरकारी काम–काज कैसे होता है ?’

‘पता है बाबू जी, इसीलिये मैंने आपको पैसे पहले ही दे दिए थे I ‘

‘हां, तो तुम्हे फंड तो मिल गया न ?’

‘तो क्या हर भुगतान के अलग-अलग पैसे देने होंगे ?’

‘क्या यह भी आपको बताना पड़ेगा ?’

‘तो यह बरियन बरियन-बरियन नमक तो हम नाहीं डाल पायेंगे I’

‘बुजुर्गवार कहाँ है आप I यह बरियों का जमाना नही है i यह ज़माना इटैलियन पिज्जा, अमेरिकन बर्गर और चाईनीज फ़ूड का है I इसमें केवल नमक से काम नही चलता और बहुत कुछ डालना पड़ता है I समझ गये न आप ?

‘हा समझ गया, बाबू जी i कभी मैं भी सरकारी कुर्सी पर था I वहाँ रहकर जो मैंने किया उसका खामियाजा भी तो मुझे ही भुगतना पड़ेगा I ’

 

(मौलिक/अप्रकाशित )

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 17, 2018 at 11:55am

आ० समर कबीर साहब , बहुर -बहुत शुक्रिया 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 17, 2018 at 11:54am

आ० शेख  शहजाद उस्मानी  साहब., बहुत-बहुत धन्यवाद 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 17, 2018 at 11:52am

आ० सुरेन्द्र इंसान जी , आपका आभार i 

Comment by Samar kabeer on December 16, 2018 at 11:57pm

जनाब डॉ. गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी आदाब,अच्छी लघुकथा लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on December 14, 2018 at 6:51am

कृपया "लघु कथा" को सुधार कर "लघुकथा" लिख दीजियेगा।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on December 14, 2018 at 6:49am

वाह। दोहरे कटाक्ष। दोहरी स्वीकारोक्ति! जैसे को तैसा। हालात-ए-हाज़रा। बेहतरीन सारगर्भित विचारोत्तेजक सबक़। हार्दिक बधाई आदरणीय डॉ. गोपाल नारायण श्रीवास्तव साहिब।

Comment by surender insan on December 13, 2018 at 10:42am

बहुत बढ़िया जी । सार्थक रचना की बधाई हो ।

कृपया ध्यान दे...

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