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गीत: तब तुम कोई गीत लिखना प्रिये!

जब पीड़ा आसुओं को मात दे,
और संभाले ना संभले मन।
जब यादें मेरी दिल पर दस्तक दें,
और बेचैन हो ये अंतर्मन।
तब तुम कोई गीत लिखना प्रिये,

मैं आऊँगी भाव बनकर ज़रूर।

जब मेरी कमी तुमको खले,
और खोजे अक्श मेरा तुम्हारा मन।
जब बोझिल हो रातें काटे ना कटे,
और नींद से आँख-मिचौली खेले नयन।
तब तुम कोई सपना सजाना प्रिये,

मैं आऊँगी तुमसे मिलने ज़रूर।

जब पतझड़ में झड़ते हो पत्ते पुरातन,
और लहरों को देख विचलित हो मन।
जब यादों के कलेवर हो गाढ़े बहुत,
और आसुओं से धुँधले हो नयन।
तब तुम कोई तस्वीर बनाना प्रिये,
मैं आऊँगी रंग भरने ज़रूर।

“मौलिक व अप्रकाशित”

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Comment by Dr. Geeta Chaudhary on January 4, 2020 at 7:27am

आदरणीय समर कबीर जी बधाई के लिए सादर आभार। सुझाव एवम् संशोधन के लिए मै विशेष रूप से आपका आभार व्यक्त करती हूं। आपकी प्रतिक्रिया का बहुत इंतजार रहता है जो आगे बढ़ने एवम् नया सीखने, लिखने की प्रेरणा देता है। सादर आभार।

Comment by Samar kabeer on January 3, 2020 at 3:32pm

मुहतरमा डॉ. गीता चौधरी जी आदाब,अच्छी रचना हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

और संभाले ना संभले मन'

"और सँभाले न सँभले मन"

'और खोजे अक्श मेरा तुम्हारा मन'

इस पंक्ति में 'अक्श' को "अक्स" कर लें । 

Comment by Dr. Geeta Chaudhary on January 2, 2020 at 2:24pm

आदरणीय प्रदीप देवीशरण जी रचना आपको पसंद आईI हार्दिक आभारI

Comment by प्रदीप देवीशरण भट्ट on January 2, 2020 at 12:55pm

बहुत खूब गीता जी,

जब मेरी कमी तुमको खले,
और खोजे अक्श* मेरा तुम्हारा मन

*(अक्स)

और आसुओं से धुँधले हो जाएं नयन।

Comment by Dr. Geeta Chaudhary on December 28, 2019 at 4:22pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी बधाई के लिए सादर आभारI

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 28, 2019 at 5:16am

आ. गीता जी, सुन्दर गीत हुआ है । हार्दिक बधाई ।

कृपया ध्यान दे...

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