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बात बर्फ सी जमी हुई है, शब्दों में है लेकिन आग ।

देखो चमन न बँटने पाये, निकले हैं जहरीले नाग ।।

                                 

                             

बाढ़ आ गई आगजनी की,तोड़-फोड़ होती अविराम ।

भाईचारा है सूली पर, लोकतंत्र के चक्के जाम ।।

राष्ट्र संपदा की बलि देकर, दुश्मन खेल रहा है फाग ।

देखो चमन न बँटने पाये , निकले हैं जहरीले नाग ।।

                             

हिंसा भीड़ तमाशे का जो, बैठे हैं लेकर हथियार ।

वे भी तो निकले हैं करने , लोकतंत्र का बंटाधार ।।

देश प्रेम से होता है क्यों,उनका हरदिन प्रबल विराग ।

देखो चमन न बँटने पाये , निकले हैं जहरीले नाग ।।

                                   

शांति और सौहार्द रौंदकर ,खंड - खंड करने की चाह । 

समरसता के प्रबल विरोधी ,ले कटुता का गरल अथाह।।

वैमनस्य का चले लगाने , बंधु -बांधवों के हृद दाग ।

देखो चमन न बँटने पाये , निकले हैं जहरीले नाग ।।

                                  ~ मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by vijay nikore on January 9, 2020 at 7:04am

रचना अच्छी लगी। बधाई, आदरणीया अनामिका जी।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 7, 2020 at 6:53am

आल्हा छंद पर आधारित गीत प्रयास के लिए हार्दिक बधाइयाँ.

भावों तथा विन्यास का सुंदर सामंजस्य प्रभावी बन पड़ा है, आदरणीया अनामिका अना जी.

शुभातिशुभ..

Comment by नाथ सोनांचली on January 5, 2020 at 4:25pm

आद0 अनामिका जी सादर अभिवादन। बढ़िया रचना लगीं, बधाई स्वीकार कीजिये।

Comment by Rachna Bhatia on January 5, 2020 at 7:59am

बहुत ही सुन्दर गीत बधाई स्वीकार करें।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 5, 2020 at 4:40am

आ. अनामिका जी, सुंदर गीत हुआ है । हार्दिक बधाई ।

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