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हालात आदमी के - डॉo विजय शंकर

कितना होशियार है आदमी ,
हर समय सचेत रहता है ,
बुद्धि को प्रखर करता रहता है,
हर एक के दिमाग को पढ़ता रहता है ,
बस, जब लुटता है तो दिमाग से नहीं,
दिल से लुटता है,पूरे दिल से लुटता है ......

दिमाग उस समय भी
उसका चौकन्ना रहता है,
खूब याद रखता है, कि कब कहाँ ,
कैसे-कैसे , कितना-कितना लुटे ,
स्मृति में सब रहता है ,
बार बार , दोहराता रहता है,
सुनाता है अपने लुटने की कहानी,
दूसरों की भी सुनता है कहानी………

और फिर तैयार होता है ,
पूरे जोश से,खरोश से,होश से ,
अपनी पूरी सामर्थ्य
और विवेक के साथ ,
फिर लुटने के लिए , अगली बार।
दिमाग फिर भी साथ रहता है,
चौकन्ना भी रहता है,
बस फैसला वो दिल से करता है,
ऐन वक़्त पे दिमाग को छुट्टी दे देता है,
इसी लिए तो बार बार लुटता है.
एक बार दिमाग का काम दिमाग से कर ले ,
काहे को बार बार लुटता है ,
काहे को बार बार लुटता है ॥
नोट - इन पंक्तियों का ताल्लुक इश्क - विश्क से यक़ीनन नहीं है।

मौलिक एवं अप्रकाशित.
डा० विजय शंकर

Views: 792

Comment

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Comment by Dr. Vijai Shanker on March 2, 2015 at 6:08am
आदरणीय उमेश कटारा जी , आभार एवं बहुत बहुत धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on March 2, 2015 at 3:10am
प्रिय मिथिलेश जी, रचना पर आपके विचार , उसे पसंद करने एवं आपकी बधाई हेतु ह्रदय से धन्यवाद, सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on March 2, 2015 at 3:05am
आदरणीय महर्षि त्रिपाठी जी, आपके विचारों का स्वागत है,रचना को पसंद करने एवं आपकी बधाई हेतु बहुत बहुत धन्यवाद, सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on March 2, 2015 at 3:03am
आदरणीय डॉ o गोपाल नारायण जी, रचना को पसंद करने एवं आपकी बधाई हेतु बहुत बहुत धन्यवाद, सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on March 2, 2015 at 3:00am
आदरणीय सोमेश जी, आपके विचारों का स्वागत, रचना को पसंद करने एवं आपकी बधाई हेतु बहुत बहुत धन्यवाद, सादर।

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on March 1, 2015 at 11:21pm

आदरणीय डॉ साहब, अच्छी कविता हुई है, शब्द "दिमांग = दिमाग" है न ! दूसरी बात .........नोट - इन पंक्तियों का ताल्लुक इश्क - विश्क से यक़ीनन नहीं है।

इसकी जरुरत क्यों पड़ गयी. कविता को खुद अपनी परिचय देने दीजिये. अच्छी रचना हुई है, खुबसूरत अभिव्यक्ति हेतु बहुत बहुत बधाई आदरणीय.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on March 1, 2015 at 10:03pm
आदरणीय डॉ विजय शंकर सर इस रचना के लिए आपको सादर बधाई।
Comment by umesh katara on March 1, 2015 at 8:01pm

वाह अतिसुन्दर साहब


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 1, 2015 at 7:10pm

आदरणीय डॉ विजय शंकर सर, सचेत करती सुन्दर रचना पर हार्दिक बधाई 

Comment by maharshi tripathi on March 1, 2015 at 6:55pm

एक और सुन्दर और सन्देश युक्त कविता पर आपको बधाई आ.विजयशंकर जी |

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