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कोई फरक नहीं पड़ता — डॉo विजय शंकर

क्या फरक पड़ता है ,
कुछ पढ़े-लिखे लोगों ने
आपको और आपकी
किसी भी बात को नहीं समझा।
आपको , आप जैसे लोगों ने तो
समझा और खूब समझा।
आपकी नैय्या उनसे और
उनकी नैय्या आपसे
पार लग ही रही है ,
आगे भी लग जाएगी ।

- मौलिक एवं अप्रकाशित
 

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Comment by नाथ सोनांचली on March 26, 2018 at 8:14pm

आद0 विजय शंकर जी सादर अभिवादन।बढिया रचना से रूबरू करवाया आपने। बधाई

Comment by Samar kabeer on March 25, 2018 at 9:39pm

आली जनाब डॉ.विजय शंकर जी आदाब,बहुत दिनों बाद आपकी रचना के दर्शन हुए ।

बहुत ख़ूब वाह, सुंदर और प्रभावशाली कविता,इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें । शीर्षक और पहली पंक्ति में 'फरक' को "फ़र्क़" कर लें ।

मुझे अपनी ग़ज़ल का एक शैर याद आ गया :-

'इक जाहिल को समझा सकते हैं जितनी आसानी से

उतना ही मुश्किल समझाना पढ़े लिखे नादानों को'

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 25, 2018 at 2:06pm

आ. भाई विजय जी बहुत खूब लिखा । हार्दिक बधाई ।

Comment by Ajay Tiwari on March 25, 2018 at 11:33am

आदरणीय विजय जी,  बहुत अच्छा व्यंग! इस काव्य-प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई.

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 25, 2018 at 9:45am

वाह आदरणीय खूब लिखा..

Comment by Shyam Narain Verma on March 23, 2018 at 5:49pm
इस सुन्दर प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई
Comment by Mohammed Arif on March 23, 2018 at 5:12pm

वाह! वाह!!  कितना कड़वा सच लिखा है आपने । सचमुच हम आज एक ऐसे वातावरण में जीने को अभिशप्त हैं जहाँ हमारा पढ़ा-लिखा  होना कोई मायने नहीं रखता है । पढ़-लिखकर हम अपने आपको शर्मिंदा महसूस करते हैं । हम भयभीत  उच्च शिक्षित हैं । बहुत ही कटाक्षपूर्ण रचना के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें आदरणीय विजय शंकर जी ।

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