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उपलब्धियाँ - डॉo विजय शंकर

उप-शीर्षक -आर्टिफिशयल इंटेलिजेंस से आर्टिफिशल हँसी तक।

प्रकृति ,
अनजान ,
पाषाण ,
ज्ञान
विज्ञान ,
गूगल ,
आट्रिफिश्यल विवेक ,
आर्टिफिशियल हँसी ,
शुभ प्रभात।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Dr. Vijai Shanker on October 20, 2017 at 7:01pm
आदरणीय डॉo आशुतोष मिश्रा जी , रचना पर उपस्थिति एवं उसे मान देने के लिए ह्रदय से आभार एवं धन्यवाद , सादर।
Comment by Samar kabeer on October 20, 2017 at 11:01am
आपकी बात पर एक पुराना मतला याद आ गया साझा कर रहा हूँ :-
'सिमतों का तअय्युन है न मंज़िल का पता है
इंसान मशीनों की तरह भाग रहा है'
Comment by Dr. Vijai Shanker on October 20, 2017 at 9:22am
आदरणीय समर कबीर साहब , नमस्कार , आपकी पकड़ बहुत गहरी और नज़र बहुत सही जगह पर पड़ती है , आभार , आभार। कुछ बात यूं समझ में आती है कि साहित्य और समाज का बड़ा गहरा रिश्ता होता है। साहित्य समाज का दर्पण होता है , समाज साहित्य को दर्पण की तरह देखता रहता है। दोनों एक दूसरे से लाभान्वित होते रहते हैं। बस इस समय कुछ वक़्त की बात है कि वर्तमान कुछ ऐसा चल रहा है कि समाज ने साहित्य से मुँह मोड़ रखा है। आप कुछ लिख दीजिये , लोग अपने में कुछ इस क़दर मशगूल हैं कि उन पर कोई असर नहीं पड़ता है। विज्ञान अपनी राह पर है , अर्थशास्त्र अपनी चिंता में डूबता-उतराता हुआ है , राजनीति का पता नहीं किस समाज के लिए हो रही है , न किसी को पानी की चिंता है , न हवा की। एक दौड़ हो रही है , सब भाग ले रहे हैं , लक्ष्य का किसी को पता बस दौड़ रहे हैं। डिजिटल दुनिया है , आकड़ों के खेल हैं , सफलताएं सर चढ़ कर बोल रहीं हैं , आदमीं अचंभित है , तरक्की हो रही है , हाथ कुछ लगे न लगे , वह वेल - इन्फोर्मेड है , इसी में खुश है। साहित्य है , जरूर है , लेकिन आदमी से थोड़ा दूर है , बेअसर है , शायद इसलिए कि यह युग , इन्फर्मेशन युग है।
आप से कुछ बात की , अच्छा लगा। आपकी बधाइयों के लिए धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on October 20, 2017 at 8:40am
आदरणीय शेख़ शहज़ाद उस्मानी जी , आपकी बात में दम है , विषय सार्थक है , प्रयास करूंगा। बस बात मूड बनाने की है। सादर।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on October 19, 2017 at 10:27pm
आदरणीय विजय सर आपकी रचनाएँ विविधता से भरी होती है आपकी सोच और आपके नूतन प्रयोग पढ़ने में आनन्ददाई होते है।।।दीवाली के इस पर्व पर हार्दिक शुभकामनायें सादर
Comment by Samar kabeer on October 18, 2017 at 12:32pm
आली जनाब डॉ.विजय शंकर जी आदाब,आपकी कविताएं दिल को छूती हुई गुज़रती हैं और दिल में घर बनाकर बैठ जाती हैं,और इसका मूल कारण है आपकी गहरी सोच जो नये नये कमाल दिखाती रहती है ।
आपकी ये कविता भी उसी श्रेणी में आती है,मस्नूई पनः पर आपने सधे हुए शब्दों में जो तंज़ किया है इस पर कई पृष्ठ लिखे जा सकते हैं,आज के इस तेज़ रफ़्तार दौर में हर चीज़ मस्नूई होती जा रही है,इस बिन्दू पर आपकी क़लम से निकली ये जादुई तहरीर अपना तिलिस्म बिखेरने में पूरी तरह कामयाब है, इस शानदार प्रस्तुति के लिए दिल की गहराइयों से मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 18, 2017 at 11:17am
दरअसल मैं उप-शीर्षक को वैकल्पिक शीर्षक समझ रहा था पाठकों के सुझाव हेतु। इस बेहतरीन उप-शीर्षक पर हम आपकी लघुकथा/व्यंग्य भी पढ़ना चाहेंगे आदरणीय सर डॉ. विजय शंकर जी।
Comment by Dr. Vijai Shanker on October 18, 2017 at 12:45am
आदरणीय मोहम्मद आरिफ जी , आपकी उपस्थिति और आपकी प्रशस्ति के लिए बहुत बहुत आभार एवं धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on October 18, 2017 at 12:45am
आदरणीय शेख़ शहज़ाद उस्मानी जी , आपका बहुत बहुत आभार। शरीरक्षक के सुझाव के लिए भी धन्यवाद। आपका रूचि लेने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया , पर संभवतः आप उप - शीर्षक से सहमत होंगे , मैंने आर्टिफिशल इंटेलिजेंस इस लिए लिया है कि आज कल गूगल की कृपा से यह शब्द बहुत अधिक चलन में है , वास्तविक है , लोग इसके महत्व को मानते हैं। उसी तरह आर्टिफिशल हाई भी है , आर्टिफिशल है पर है , फेफड़ों और नसों पर असर तो करती है। दोनों बातें जीवन में आ चुकी हैं। कितनी सफल होगीं , यह तो भविष्य बताएगा। आशा है आपको इस दृष्टि से उप- शीर्षक उपयुक्त लगेगा। एक बार पुनः आभार , सादर।
Comment by Mohammed Arif on October 17, 2017 at 4:59pm
वाह! वाह!! मज़ा आ गया । गागर में सागर समा दिया आपने । बहुत ही बेहतरीन कटाक्ष । हार्दिक बधाइयाँ स्वीकार करें आदरणीय विजय शंकर जी ।

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