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हक़ की लड़ाई (लघुकथा)- डॉo विजय शंकर

दोनों बुराई के लिये लड़ रहे थे, एक दूसरे पर खूब कीचड़ उछाल रहे थे ।
देखने वालों ने समझा दोनों बुराई मिटा के रहेंगे ,
जब कि वो दोनों बुराई पर अपना अपना हक़ जता रहे थे।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by maharshi tripathi on July 23, 2015 at 10:50pm

कम शब्दों की उम्दा लघुकथा हेतु आपको हार्दिक बधाई आ. Dr. Vijai Shanker जी |


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 23, 2015 at 10:44pm

आदरणीय विजय शंकरजी, आपकी अनुभवपगी परख इतनी गहरी हुआ करती है कि आपकी कई टिप्पणियाँ बारम्बार पठनीय हो जाती है.
इस लघुकथा के माध्यम से जिस तथ्य का निर्वहन हुआ है वह प्रासंगिक व्यंग्य का अत्युत्तम उदाहरण है. संप्रेषणीयता को अवश्य तनिक और सार्थक सुगढ़ आयाम दिया जा सकता है. परन्तु यह भी सत्य है कि इस लघुकथा को ससम्मान उद्धृत किया जा सकता है.
इस प्रस्तुति हेतु हृदय से बधाइयाँ और शुभकामनाएँ आदरणीय.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 23, 2015 at 10:09pm

कम शब्दों में बहुत बढ़िया कटाक्ष आ० विजय शंकर जी दिल से बधाई आपको 

Comment by विनय कुमार on July 23, 2015 at 7:25pm

बहुत उम्दा रचना , जैसे अहिंसा के विचार लिए हिंसा करना , वैसे ही ये लड़ाई | बधाई आदरणीय.

Comment by Sushil Sarna on July 23, 2015 at 5:51pm

सुंदर  व्यंग्य की  इस सुंदर लघु कथा के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय। 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on July 23, 2015 at 4:34pm

इस लघुकथा के माध्यम से आपने सही व्यंग्य किया है बहुत बहुत बधाई आपको इस रचना के लिये


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 23, 2015 at 1:30pm

बहुत ही बढ़िया व्यंग्य हुआ है आदरणीय विजय शंकर सर, आपकी सूक्ष्म वैचारिकता का सधे हुए ढंग से शाब्दिक किया जाना मुग्ध कर गया. और इस पर शीर्षक का चयन तो कमाल है. बहुत गहराई से विचार उपरान्त यह रचना हुई है .... इस बहुत सुन्दर प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई 

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