For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ग़ज़ल-बन के' सूरज सा' जमाने में' निकलते रहिये-रामबली गुप्ता

वह्र-2122 1122 1122 22

बन के' सूरज सा' जमाने में' निकलते रहिये,
हर अँधेरे को' उजाले मे' बदलते रहिये।

जिंदगी एक सफर खुशियों' भरा हो साहिब!
हर कदम आप मेरे साथ जो' चलते रहिये।।

दिल के' मन्दिर में उजाले की' वज़ह आप सनम,
अब तो इस दिल मे' सदा ज्योति सा' जलते रहिये।

दिल की बगिया में बहारों के सुमन मुस्काएं,
इसमें गर रोज सनम आप टहलते रहिये।

मैं जो' हूँ साथ जमाने से' भला डर कैसा?
हो के मायूस न यूं शाम से ढलते रहिये।

मेरे' हर गीत-ग़ज़ल-नज़्म-तरानों में' सनम!
बन के' अब शब्द नये प्यार के ढलते रहिये।।

दिल की बगिया में खिले प्यार के फूलों को सनम!
यूं जफ़ा के पा' तले भी न मसलते रहिये।।

लूटते चैन अमन जो भी वतन का साहब!
ऐसे' साँपो के' उठे फण को' कुचलते रहिये।

रचना-रामबली गुप्ता
मौलिक एवं अप्रकाशित

पा=पैर

Views: 748

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Ravi Shukla on October 12, 2016 at 3:45pm

आदरणीय राम बली जी बहुत बहुत बधाई इस सुन्‍दर गजल के लिये । आदरणीय समर साहब की चर्चा से वार्ता में समरसता बढ़ गई है 

Comment by Samar kabeer on October 11, 2016 at 5:12pm
मिसाल के तौर पर,मेरे महबूब,जानम, जानां,जान ये सारे शब्द ज़रूरत के मुताबिक़ ले सकते हैं ।
Comment by रामबली गुप्ता on October 10, 2016 at 10:12pm
आद0 समर भाई साहब आपके प्रोत्साहन और सराहना से दिली खुशी हुई। किसी भी रचना में एक ही शब्द का एक ही मायने में कई बार प्रयुक्त होना पुनरुक्ति दोष होने के साथ साथ पढने और सुनने में कटु लगता है। चूंकि ग़ज़ल का प्रत्येक शेर अपने आप में एक इकाई होता है इसलिए इसे दोष नही मानते लेकिन है तो एक ही ग़ज़ल में इसलिए यथा संभव दुहराव से बचना सर्वथा उचित ही है। सनम शब्द का कई जगह रखना मुझे भी खटका था और कर्णकटु भी लगा किन्तु क्या कहूँ समस्या ये है भाई साहब कि मैं ठहरा हिंदी का छात्र मेरे पास उर्दू शब्दकोश शून्य है। हिंदी में एक शब्द "प्रिये" है किन्तु यह संस्कृतनिष्ठ होने के कारण प्रयुक्त करना उचित न लगा। शब्दकोश की कमी के कारण कभी कभी रचनाकर्म में बड़ी कठिनाई उठानी पड़ती है। सनम का कोई दूसरा विकल्प आप सुझाईये ।सानुरोध
Comment by Samar kabeer on October 10, 2016 at 9:03pm
जनाब रामबली गुप्ता जी आदाब,बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल हुई है, मज़ा आ गया,वाह बहुत ख़ूब, शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।
एक बात अर्ज़ करना चाहूंगा,आपकी ग़ज़ल में चार बार "सनम" शब्द इस्तेमाल हुआ है जो कि दोष तो नहीं है,मेरा कहना सिर्फ़ इतना है कि अपने महबूब को किसी दूसरे नाम से भी पुकारें भाई हा हा हा..
Comment by रामबली गुप्ता on October 10, 2016 at 4:32pm
धन्यवाद भाई सुरेन्द्र नाथ जी
Comment by रामबली गुप्ता on October 10, 2016 at 4:24pm
आद0 वासुदेव भाई जी सराहना के लिए धन्यवाद
Comment by रामबली गुप्ता on October 10, 2016 at 4:23pm
हार्दिक आभार आद0 सुरेश भाई जी
Comment by नाथ सोनांचली on October 10, 2016 at 5:34am
आदरणीय रामबली जी खुबसूरत अशआर के साथ गजल के लिए बधाई कबूल फरमायें
Comment by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on October 9, 2016 at 9:17pm
आ.रामबली गुप्ताजी शेर दर शेर सुंदर ग़ज़ल की बधाई स्वीकारें।
Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on October 9, 2016 at 8:16pm
लूटते चैन अमन जो भी वतन का साहब!
ऐसे' साँपों के' उठे फण को' कुचलते रहिये।
वाह आदरणीय रामबली गुप्ता जी बहुत ही सुन्दर विचारों से नवाजा है गजल को।हार्दिक बधाई स्वीकार करें । सादर ।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Admin replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-128 (विषय मुक्त)
"स्वागतम"
14 hours ago
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion र"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-185
"जी बहुत शुक्रिया आदरणीय चेतन प्रकाश जी "
15 hours ago
Dayaram Methani replied to Admin's discussion र"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-185
"आदरणीय मिथलेश वामनकर जी, प्रोत्साहन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।"
17 hours ago
Chetan Prakash replied to Admin's discussion र"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-185
"आ.लक्ष्मण सिंह मुसाफिर साहब,  अच्छी ग़ज़ल हुई, और बेहतर निखार सकते आप । लेकिन  आ.श्री…"
19 hours ago
Chetan Prakash replied to Admin's discussion र"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-185
"आ.मिथिलेश वामनकर साहब,  अतिशय आभार आपका, प्रोत्साहन हेतु !"
19 hours ago
Chetan Prakash replied to Admin's discussion र"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-185
"देर आयद दुरुस्त आयद,  आ.नीलेश नूर साहब,  मुशायर की रौनक  लौट आयी। बहुत अच्छी ग़ज़ल…"
19 hours ago
Chetan Prakash replied to Admin's discussion र"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-185
" ,आ, नीलेशजी कुल मिलाकर बहुत बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई,  जनाब!"
19 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion र"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-185
"आ. भाई मिथिलेश जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और स्नेह के लिए आभार।"
21 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion र"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-185
"आ. भाई नीलेश जी, सादर अभिवादन।  गजल पर उपस्थिति और स्नेह के लिए आभार। भाई तिलकराज जी द्वार…"
21 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion र"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-185
"आ. भाई तिलकराज जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और विस्तृत टिप्पणी से मार्गदर्शन के लिए आभार।…"
21 hours ago
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion र"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-185
"तितलियों पर अपने खूब पकड़ा है। इस पर मेरा ध्यान नहीं गया। "
21 hours ago
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion र"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-185
"आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी नमस्कार बहुत- बहुत शुक्रिया आपका आपने वक़्त निकाला विशेष बधाई के लिए भी…"
22 hours ago

© 2025   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service