For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-112

परम आत्मीय स्वजन,

ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरे के 112वें अंक में आपका हार्दिक स्वागत है| इस बार का मिसरा -ए-तरह जनाब  मिर्ज़ा ग़ालिब साहब की ग़ज़ल से लिया गया है|

"लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं "

221     2121      1221        212 

मफ़ऊलु       फ़ाइलातु    मुफाईलु    फाईलुन

(बह्र: मुजारे मुसम्मन् अखरब मक्फूफ महजूफ )

रदीफ़ :- भी नहीं  
काफिया :- आर ( बेकार, इंकार, इतवार बाज़ार आदि)

मुशायरे की अवधि केवल दो दिन है | मुशायरे की शुरुआत दिनाकं 25 अक्टूबर दिन शुक्रवार को हो जाएगी और दिनांक 26 अक्टूबर दिन शनिवार समाप्त होते ही मुशायरे का समापन कर दिया जायेगा.

 

नियम एवं शर्तें:-

  • "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" में प्रति सदस्य अधिकतम एक ग़ज़ल ही प्रस्तुत की जा सकेगी |
  • एक ग़ज़ल में कम से कम 5 और ज्यादा से ज्यादा 11 अशआर ही होने चाहिए |
  • तरही मिसरा मतले को छोड़कर पूरी ग़ज़ल में कहीं न कहीं अवश्य इस्तेमाल करें | बिना तरही मिसरे वाली ग़ज़ल को स्थान नहीं दिया जायेगा |
  • शायरों से निवेदन है कि अपनी ग़ज़ल अच्छी तरह से देवनागरी के फ़ण्ट में टाइप कर लेफ्ट एलाइन, काले रंग एवं नॉन बोल्ड टेक्स्ट में ही पोस्ट करें | इमेज या ग़ज़ल का स्कैन रूप स्वीकार्य नहीं है |
  • ग़ज़ल पोस्ट करते समय कोई भूमिका न लिखें, सीधे ग़ज़ल पोस्ट करें, अंत में अपना नाम, पता, फोन नंबर, दिनांक अथवा किसी भी प्रकार के सिम्बल आदि भी न लगाएं | ग़ज़ल के अंत में मंच के नियमानुसार केवल "मौलिक व अप्रकाशित" लिखें |
  • वे साथी जो ग़ज़ल विधा के जानकार नहीं, अपनी रचना वरिष्ठ साथी की इस्लाह लेकर ही प्रस्तुत करें
  • नियम विरूद्ध, अस्तरीय ग़ज़लें और बेबहर मिसरों वाले शेर बिना किसी सूचना से हटाये जा सकते हैं जिस पर कोई आपत्ति स्वीकार्य नहीं होगी |
  • ग़ज़ल केवल स्वयं के प्रोफाइल से ही पोस्ट करें, किसी सदस्य की ग़ज़ल किसी अन्य सदस्य द्वारा पोस्ट नहीं की जाएगी ।

विशेष अनुरोध:-

सदस्यों से विशेष अनुरोध है कि ग़ज़लों में बार बार संशोधन की गुजारिश न करें | ग़ज़ल को पोस्ट करते समय अच्छी तरह से पढ़कर टंकण की त्रुटियां अवश्य दूर कर लें | मुशायरे के दौरान होने वाली चर्चा में आये सुझावों को एक जगह नोट करते रहें और संकलन आ जाने पर किसी भी समय संशोधन का अनुरोध प्रस्तुत करें | 

मुशायरे के सम्बन्ध मे किसी तरह की जानकारी हेतु नीचे दिये लिंक पर पूछताछ की जा सकती है....

फिलहाल Reply Box बंद रहेगा जो 25 अक्टूबर दिन शुक्रवार लगते ही खोल दिया जायेगा, यदि आप अभी तक ओपन
बुक्स ऑनलाइन परिवार से नहीं जुड़ सके है तो www.openbooksonline.comपर जाकर प्रथम बार sign upकर लें.


मंच संचालक
राणा प्रताप सिंह 
(सदस्य प्रबंधन समूह)
ओपन बुक्स ऑनलाइन डॉट कॉम

Views: 1608

Replies are closed for this discussion.

Replies to This Discussion

उनसे हुई हैं आंखें अभी चार भी नहीं 

दिल उनका हो चुका है ये इनकार भी नहीं (1)
माना न जीत पाये मुहब्बत के खेल में 
मंज़ूर हमको अपनी मगर हार भी नहीं (2)
आयें न जिंदगी के हमें पेच-ओ-ख़म नज़र
इतने तो हम तुम्हारे तलबगार भी नहीं (3)
हाथों की आड़ी तिरछी लकीरें सुधार दे 
ऐसा कोई जहान में औज़ार भी नहीं (4)
चाहत की क्या करेगा तिजारत कोई भला 
बिकती हो ये जहाँ कोई बाज़ार भी नहीं (5)
आता नहीं किसी पे ये कमबख़्त दिल मेरा 
आये किसी का इस पे ये आसार भी नहीं (6)
ऐ ज़िंदगी वजूद तेरा है कहाँ बता 
उस पार गर नहीं है तो इस पार भी नहीं (7)
तक़रार की अनोखी अदा उनकी देखिये
लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं (गिरह)
जिस रोज देर से सभी सो के उठें 'सिफ़र'
माँ की तो ज़िंदगी में वो इतवार भी नहीं (8)
मौलिक ,अप्रकाशित, स्वरचित
अंजलि 'सिफ़र'

मुहतरमा अंजलि गुप्ता जी आदाब,तरही मिसरे पर ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें।

आदरणीय समर कबीर sir, हौसला अफ़ज़ाई के लिए और ग़ज़ल को अपना अमूल्य समय देने के लिए दिल से शुक्रिया। इस बार हुई देरी के लिए क्षमा चाहती हूँ।

आदरणीया अंजलि गुप्ता जी बहुत ही उम्दा ग़ज़ल से मंच को नवाज़ा आपने बहुत बहुत मुबारकबाद आपको।

आदरणीय नादिर ख़ान जी , हौसला अफ़ज़ाई के लिए आपका दिली शुक्रिया

मुहतरमा अंजलि साहिबा, अच्छी गज़ल हुई है मुबारकबाद कुबूल फरमाएं l 

आदरणीय tasdiq ahmed khan जी , हार्दिक आभार आपका

आदरणीया अंजलि गुप्ता 'सिफर' जी नमस्कार बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है हार्दिक बधाई स्वीकार करें मतला और सभी शैर बहुत अच्छे हुए हैं बहुत बहुत बधाई! गुस्ताखी माफ़ हो मुझे जाने ऐसा क्यूँ लगता है मक़्ता और स्पष्ट हो सकता था

आदरणीय dandpani nahak जी , हौसला अफ़ज़ाई के लिए शुक्रिया। यूँ कहें तो, / जिस दिन सभी आराम से सोकर उठें 'सिफ़र' , 

acchi ghazal hai. bahut mubarak

221     2121   1221   212 

झूठों का साथ देने से इंकार भी नहीं

है सच कि लोग इतने वफ़ादार भी नहीं

हासिल इमान से न हमें यारो कुछ हुआ 

बाज़ार में तो इसका ख़रीदार भी नहीं

इंसान ग़लतियों का है पुतला सही मगर

यह बात मानने को वो तैयार भी नहीं

लेते जनाब झूठ के सब खूब फायदे

है कौन जिसका इससे सरोकार भी नहीं

लफ़्ज़ों पे एतबार नहीं आंखों से ही कहो

चाहत न हम तुम्हारी तुम्हें प्यार भी नहीं

हर दर्द ज़िन्दगी का मिला मुस्कुरा हमें

अब फ़ेरें मुंह उससे ये संस्कार भी नहीं

**कहते सुख़नवरों से न आसान जीतना 

लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं "**

मौलिक व अप्रकाशित

मुहतरमा रचना भाटिया जी आदाब,तरही मिसरे पर ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।

'हासिल इमान से न हमें यारो कुछ हुआ'

इस मिसरे में 'ईमान' की मात्रा गिराना उचित नहीं है,इस मिसरे को यूँ किया जा सकता है:-

'हासिल हुआ न कुछ हमें ईमान से यहाँ'

'लफ़्ज़ों पे एतबार नहीं आंखों से ही कहो

चाहत न हम तुम्हारी तुम्हें प्यार भी नहीं'

इस शैर के दोनों मिसरों में रब्त नहीं है,और ऊला मिसरा बह्र में नहीं है,देखियेगा ।

'हर दर्द ज़िन्दगी का मिला मुस्कुरा हमें

अब फ़ेरें मुंह उससे ये संस्कार भी नहीं'

इस शैर के ऊला का शिल्प कमज़ोर है,और सानी मिसरा  बह्र में नहीं है,इस शैर को यूँ किया जा सकता है:-

'हर दर्द ज़िन्दगी का सहा मुस्कुरा के ही 

हम इससे मुँह को फेरें ये किरदार भी नहीं'

RSS

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

सालिक गणवीर commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( ये नया द्रोहकाल है बाबा...)
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी जी. सादर प्रणाम बकौल दुश्यंत कुमार.. सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद…"
4 hours ago
सालिक गणवीर commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( ये नया द्रोहकाल है बाबा...)
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी जी. सादर प्रणाम बकौल दुश्यंत कुमार.. सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद…"
4 hours ago
रणवीर सिंह 'अनुपम' commented on रणवीर सिंह 'अनुपम''s blog post हल हँसिया खुरपा जुआ (कुंडलिया)
"आदरणीय, अग्रज राम अवध जी नमन। उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद।"
7 hours ago
रणवीर सिंह 'अनुपम' commented on रणवीर सिंह 'अनुपम''s blog post हल हँसिया खुरपा जुआ (कुंडलिया)
"आदरणीय, अग्रज कबीर जी नमन। उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद।"
7 hours ago
Anvita commented on Anvita's blog post चाहती हूँ
"माननीय अमीरूददीन साहब प्रणाम ।आपका हार्दिक धन्यवाद ।रचना पसंद आई जानकर अच्छा लगा ।सादर।अन्विता ।"
7 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post जीवन पर कुछ दोहे :
"आ . भाई सुशील जी, सादर अभिवादन । अच्छे दोहे हुए हैं । हार्दिक बधाई ।"
8 hours ago
Samar kabeer commented on Admin's page FAQ
"डिम्पल जी,मैंने आपको फ़ोन पर समझाया तो था,अगर और समझना हो तो फिर से फ़ोन कर सकती हैं । आपकी टिप्पणी…"
8 hours ago
Dimple Sharma commented on Admin's page FAQ
"अपनी रचना पर आए कमेंट्स पर अपनी प्रतिक्रिया कैसे दें..?"
8 hours ago
Pratibha Sharma left a comment for Pratibha Sharma
"बहुत बहुत शुक्रिया आपका"
9 hours ago
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on Anvita's blog post चाहती हूँ
"वाह। सुश्री अन्विता जी, ग़ज़ब का चिन्तन और सृजन है। मन के तारों को झंकृत कर दिया आपकी रचना…"
9 hours ago
अमीरुद्दीन 'अमीर' left a comment for Pratibha Sharma
"सुश्री प्रतिभा शर्मा जी, आदाब। ओबी ओ के मंच पर आपका हार्दिक स्वागत करते हैं। "
9 hours ago
Pratibha Sharma is now a member of Open Books Online
9 hours ago

© 2020   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service