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भारत वस्तुतः गाँवों का देश है. यहाँ के गाँव प्रकृति और प्राकृतिक परिवर्त्तनों से अधिक प्रभावित होते हैं, बनिस्पत अन्य भौतिक कारणों से. चाहे भौगोलिक रूप से देश के किसी परिक्षेत्र में हों, गाँव  प्रकृतिजन्य घटनाओं से विशेष रूप से प्रभावित होते हैं. गाँवों की व्यावसायिक गतिविधियाँ मुख्यतः कृषि पर निर्भर करती है. यही कारण है, कि अपने देश को कृषिप्रधान देश कहा जाता रहा है. कृषि-कार्य के क्रम में प्राकृतिक (और खगोलीय) गतिविधियों पर हमारी निर्भरता हमारे सम्पूर्ण

क्रियाकलाप में दीखती है. सभी छः ऋतुओं के चक्र, दैनिक प्रात-रात का प्रभाव, धरती की घुर्णन गति से होने वाले परिवर्त्तन, चन्द्र कलाओं का प्रभाव, सूर्य के परिवृत धरती का परिधि बनाना,  सारा कुछ हमारी दैनिक क्रियाओं को प्रभावित करते हैं.

 
सूर्य का उत्तरायण या दक्षिणायण होना ऋतुओं के एक पूरे समुच्चय (सेट) को परे हटा कर एक नये ऋतु-समुच्चय के आगमन का कारण होता है. पृथ्वी पर सूर्य की स्थिति वस्तुतः पृथ्वी की मुख्यतः तीन मान्य काल्पनिक रेखाओं के सापेक्ष नियत मानी जाती है  --विषुवत् रेखा के समानान्तर उत्तरी गोलार्द्ध में कर्क-रेखा तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में मकर रेखा.  सूर्य की ये स्थितियाँ पृथ्वी के अपने अक्ष पर साढ़े तेइस डिग्री नत (झुके) होने के कारण आभासी होती हैं. सूर्य का मकर रेखा के ऊपर अवस्थित होना भारत की भौगोलिक स्थिति के लिहाज से शीत काल के ऋतु-चक्र का कारण बनता है जबकि कर्क रेखा के ऊपर होना ग्रीष्म की सभी ऋतु-समुच्चयों के होने का कारण होता है. दोनों घटनाओं के मध्य का परिवर्त्तन-समय संक्रान्ति-काल कहा जाता है.
 
सूर्य का दक्षिणायण होना मानव की तमसकारी प्रवृतियों के उत्कट होने का द्योतक है. समस्त प्रकृति और प्राकृतिक गतिविधियाँ एक तरह से ठहराव की स्थिति में आ जाती हैं. सकारात्मक वृत्तियाँ निष्प्रभावी सी हो जाती हैं या कायिक-मानसिक दृष्टि से सुषुप्तावस्था की स्थिति हावी रहती है.  इस के उलट सूर्य का उत्तरायण होना कायिक, मानसिक तथा प्राकृतिक रूप से सकारात्मक वृत्तियों के प्रभावी होने का द्योतक है.  मानव-मन के चित्त पर सद्-विचारों का प्रभाव काया पर तथा मानवीय काया का सुदृढ़ नियंत्रण समस्त क्रियाकलाप पर स्पष्ट दीखने लगता है. अतः, भारत के लिहाज से सूर्य का उत्तरायण होना उत्साह और ऊर्जा के संचारित होने का काल है. यही कारण है कि यह समय सूर्य की खगोलीय स्थिति पर निर्भर होने के कारण सौर-तिथि विशेष के सापेक्ष नियत होता है.  संक्षेप में कहें तो ’मकर-संक्रान्ति’ सूर्य के दक्षिणी गोलार्द्ध से उत्तरी गोलार्द्ध में स्थानान्तरित हो कर स्थायी होने का परिचायक है.
 
पूरे भारत वर्ष में यह पर्व सोत्साह मनाया जाता है. भाषायी लिहाज से इसका नाम चाहे जो हो, किन्तु, पर्व की मूल अवधारणा मनस-उत्फुल्लता, चैतन्य-चित्त और कृषि-प्रयास को ही इंगित करती है. ग्रेग्रोरियन कैलेन्डर के अनुसार चौदह या पन्द्रह जनवरी का दिन ’मकर-संक्रान्ति’ का नियत दिन है.
 
यह दिन भारत के भिन्न प्रदेश में उत्साहपूर्वक मनाया जाता है. क्यों न हम देश के कुछ प्रदेशों में पर्व के मनाये जाने की विधियाँ देखें.

इनमें से कई प्रदेशों में इस पर्व-समारोह में मुझे सम्मिलित होने का सुअवसर मिला है जो मेरी ज़िन्दग़ी के सबसे कीमती अध्यायों में से है - 
 
उत्तर प्रदेश
उत्तर प्रदेश में इस दिन को ’खिचड़ी’ के नाम से जानते हैं. पवित्र नदियों, जैसे कि गंगा, में प्रातः स्नान कर दान-पुण्य किया जाता है. तिल का दान मुख्य होता है. तिल आर्युवेद के अनुसार गर्म तासीर का होता है. अतः तिल के पकवान-मिष्टान्न का विशेष महत्त्व है.  सूबे में प्रयाग क्षेत्र में संगम के घाट पर एक मास तक चलने वाला ’माघ-मेला’ विशेष आकर्षण हुआ करता है. वाराणसी, हरिद्वार और गढ़-मुक्तेश्वर में भी स्नान का बहुत ही महत्त्व है.  हम सभी  ’ऊँ विष्णवै नमः’ कह कर तिल, गुड़(Jaggery), अदरक, नया चावल, उड़द की छिलके वाली दाल, बैंगन, गोभी, आलू और क्षमतानुसार धन का दान करते हैं जो कि इस पर्व का प्रमुख कर्म है. और, चावल-दाल की स्वादिष्ट खिचड़ी का भोजन भला कौन भूल सकता है, यह कहते हुए --’खिचड़ी के चार यार,  दही पापड़ घी अचार ’ !
 
बिहार
बिहार में सारी विधियाँ उत्तर प्रदेश की परंपरा के अनुसार ही मनाते हैं.  पवित्र नदियों का स्नान और दान-पुण्य मुख्य कर्म है. गंगा में स्नान का विशेष महत्त्व है.  साथ ही साथ मिथिलांचल और बज्जिका क्षेत्र (मुज़फ़्फ़रपुर मण्डल) में इस दिन ’दही-चूड़ा’ खाने का विशेष महत्त्व है. और खिचड़ी का सेवन तो है ही !  साथ में गन्ना खाने की भी परिपाटी है.  


बंगाल
गंगा-सागर, जहाँ पतित-पाविनी गंगा का समुद्र से महा-मिलन होता है, में बहुत बड़ा मेला लगता है. गंगा-सागर में ऐसा प्रतीत होता है कि भगीरथ के घोर तपस के परिणाम से राजा सगर के श्रापग्रस्त साठ हजार पुत्रों की मुक्ति का कारण बनी गंगा कर्म-पूर्णता के पश्चात निर्भाव बनी उन्मीलित हुई जा रही है. यहाँ भी तिल का दान मुख्य कर्म है.
 
तमिलनाडु
मकर-संक्रान्ति पर्व को तमिलनाडु में ’पोंगल’ के नाम से जानते हैं, जोकि एक तरह का पकवान है. पोंगल चावल, मूँगदाल और दूध के साथ गुड़ डाल कर पकाया जाता है. यह एक तरह की खिचड़ी ही है. तमिलनाडु में पोंगल सूर्य, इन्द्र देव, नयी फसल तथा पशुओं को समर्पित पर्व है जोकि चार दिन का हुआ करता है और अलग-अलग नामों से जाना जाता है.  इसकी कुल प्रकृति उत्तर भारत के ’नवान्न’ से मिलती है.

पर्व का पहला दिन भोगी पोंगल के रूप में मनाते हैं. भोगी  इन्द्र को कहते हैं. इस तड़के प्रातः काल में कुम्हड़े में सिन्दूर डाल कर मुख्य सड़क पर पटक कर फोड़ा जाता है. आशय यह होता है कि इन्द्र बुरी दृष्टि से परिवार को बचाये रखे.  घरों और गलियों में सफाई कर जमा हुए कर्कट को गलियों में ही जला डालते हैं. पर्व का दूसरा दिन सुरियन पोंगल के रूप में जाना जाता है. यह दिन सूर्य की पूजा को समर्पित होता है. इसी दिन नये चावल और मूंगदाल को गुड़ के साथ दूध में पकाया जाता है. तीसरा दिन माडु पोंगल कहलाता है. माडु का अर्थ ’गाय’ या ’गऊ’ होता है. गाय को तमिल भाषा में पशु  भी कहते हैं. इस दिन कृषि कार्य में प्रयुक्त होने वाले पशुओं को ढंग-ढंग से सजाते हैं. और पशुओं से सम्बन्धित तरह-तरह के समारोह आयोजित होते हैं. यह दिन हर तरह से विविधता भरा दिन होता है. इस दिन को मट्टू पोंगल  भी कहते हैं. आखिरी दिन अर्थात् चौथा दिन कनिया पोंगल के नाम से जाना जाता है. इस दिन कन्याओं की पूजा होती है. आम्र-पलल्व और नारियल के पत्तों से दरवाजे पर तोरण बनाया जाता है. महिलाएं इस दिन घर के मुख्य द्वारा पर कोलम यानी रंगोली बनाती हैं. आखिरी दिन होने से यह दिन बहुत ही धूमधाम के साथ मनाते हैं. लोग नये-नये वस्त्र पहनते है और उपहार आदि का आदान-प्रदान करते हैं. 

 

आंध्र प्रदेश

आंध्र में पोंगल कमोबेश तमिल परिपाटियों के अनुसार ही मनाते हैं. अलबत्ता भाषायी भिन्नता के कारण दिनों के नाम अवश्य बदल जाते हैं. आंध्र में इस पर्व को पेड्डा पोंगल कहते हैं, यानि बहुत ही बड़ा उत्सव ! पहले दिन को भोगी पोंगलकहते हैं, दूसरा दिन संक्रान्ति कहलाता है. तीसरे दिन को कनुमा पोंगल कहते हैं जबकि चौथा दिन मुक्कनुमा पोंगल के नाम से जाना जाता है. उत्साह और विविधता में आंध्र का पर्व तमिलनाडु से कत्तई कम नहीं होता है.

 

महाराष्ट्र

महाराष्ट्र में मकर-संक्रान्ति को संक्रान्ति के नाम से ही जानते हैं. यहाँ तिल और गुड़ का अत्यंत विशेष महत्त्व है. गुड़ को महराष्ट्र में गुळ  का उच्चारण देते हैं.  लोग-बाग एक-दूसरे को ’तिल-गुळ घ्या, गोड़-गोड़ बोला’ यानि ’तिल-गुड़ लीजिये, मीठा-मीठा बोलिये’ कह कर शुभकामनाएँ देते हैं. नये-नये वस्त्र पहनना आज की विशेष परिपाटी है. प्रदेश में सधवा महिलाओं द्वारा हल्दी-कुंकुम की रस्म भी मनायी जाती है, जिसके अनुसार एक स्थान की सभी सुहागिनें जुट कर एक-दूसरे को सिन्दूर लगाती हैं और सदा-सुहागिन रहने का आशीष लेती-देती हैं. महाराष्ट्र में पतंग उड़ाने की परिपाटी है. आकाश पतंगों से भर जाता है. 

 

कर्नाटक

इस प्रदेश में यह पर्व सम्बन्धियों और रिश्तेदारों या मित्रों से मिलने-जुलने के नाम समर्पित है. यहाँ इस दिन पकाये जाने वाले पकवान को एल्लु कहते हैं, जिसमें तिल, गुड़ और नारियल की प्रधानता होती है. उत्तर भारत में इसी तर्ज़ पर काली तिल का तिलवा बनाते और खाते हैं. पूरे कर्नाटक प्रदेश में एल्लु और गन्ने को उपहार में लेने और देने का रिवाज़ है. इस पर्व को इस प्रदेश में संक्रान्ति ही कहते हैं. यहाँ भी चावल और गुड़ का पोंगल बना कर खाते हैं और उसे पशुओं को खिलाया जाता है. यहाँ ’एल्लु बेल्ला थिन्डु, ओल्ले मातु आडु’ यानि ’तिल-गुड़ खाओ और मीठा बोलो’ कह कर सभी अपने परिचितों और प्रिय लोगों को एक दूसरे को शुभकामनाएँ देते हैं.

 

गुजरात
गुजरात में यह रस्म महाराष्ट्र की तरह ही मनाते हैं. बस उपहार लेने-देने की विशेष परिपाटी है जहाँ घर के मुखिया अपने परिवारिक सदस्यों को कुछ न कुछ उपहार देते हैं. तिल-गुड़ के तिलवे या लड्डू को मुख्य रूप से खाते हैं.

सर्वोपरि होती है, पतंगबाजी. स्नानादि कर बाल-वृद्ध, स्त्री-पुरुष सभी मैदान या छत पर पतंग और लटाई ले कर निकल पड़ते हैं.

पतंगबाजी गुजरात प्रदेश की पहचान बन चुकी है और प्रदश के कई जगहों पर इसकी प्रतियोगिताएँ होती हैं. अब तो पतंगबाजी की अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताएँ भी आयोजित होने लगी हैं.  पूरे गुजरात प्रदेश में पतंग उड़ाना शुभ माना जाता है.

 

पंजाब

इस समय पंजाब प्रदेश में अतिशय ठंढ पड़ती है. यहाँ इस पर्व को ’लोहड़ी’ कहते हैं जो कि मकर संक्रान्ति की पूर्व संध्या को मनाते हैं. इस दिन अलाव जला कर उसमें नये अन्न और मुंगफलियाँ भूनते हैं और खाते-खिलाते हैं. ठीक दूसरे दिन की सुबह संक्रान्ति का पर्व मनाया जाता है. जिसे ’माघी’ कहते हैं. 
 
असम (अहोम)
इस पर्व को भोगली बिहू के नाम से जना जाता है. बिहू असम प्रदेश का बहुत ही प्रसिद्ध और उत्सवभरा पर्व है. इस दिन कन्याएँ विशेष नृत्य करती हैं जिसे बिहू ही कहते हैं. भोगली शब्द भोग से आया है, जिसका अर्थ है खाना-पीना और आनन्द लेना. खलिहान धन-धान्य से भरा होने का समय आनन्द का ही होता है. रात भर खेतों और खुले मैदानों में अलाव जलता है जिसे मेजी कहते हैं. उसके गिर्द युवक-युवतियाँ ढोल की आनन्ददायक थाप पर बिहू के गीत गाते हैं और बिहू नृत्य होता है जो कि असम प्रदेश की पहचान भी है. 

 

 

केरल

केरल में सबरीमलै पर अयप्पा देवता का बड़ा ही महातम है. उनकी पूजा-प्रक्रिया चालीस दिनों तक चलती है और चालीसवाँ दिन संक्रान्ति के दिन होता है जिसे बहुत ही धूमधाम से मनाते हैं. सारे भक्त काले वस्त्र पहन कर कठिन साधना करते हैं. 
 

इस तरह से देखें तो मकर-संक्रान्ति का पर्व पूरे भारत में सोल्लास मनाया जाता है.  दूसरे, यह भी देखा जाता है कि तिल, नये चावल, गुड़ और गन्ने का विशेष महत्त्व है. सर्वोपरि, भारत के पशुधन की महत्ता को स्थापित करता यह पर्व इस भूमि का पर्व है.

 

आइये, हम मकर-संक्रान्ति का पर्व सदाचार और उल्लास से मनाएँ और सभी के साथ मीठा-मीठा बोलें.

 

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--सौरभ

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मकर संक्रान्ति पर और पढ़ें  -- मकर संक्रान्ति : कुछ तथ्य

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Replies to This Discussion

//इन मान्‍यताओं से हमारी प्रतिबद्धता जिस प्रकार आनंद के अवसर उपलब्‍ध कराती है वह अन्‍य संस्‍कृतियों को सदैव ही आकर्षित करती रही है।//

आदरणीय तिलकराजजी, यही तो हमारी संस्कृति के लिए खतरा और बाधा भी है.

किसी पुष्प की अति सुन्दरता उसके मिटने और बर्बाद होने का कारण भी हो जाया करती है, यदि उक्त पुष्प के पौधे या उसके संरक्षक उसके बचाव की कोई सटीक साधन और तैयारी न विकसित कर लें. आज हमारी संस्कृति की उत्सवधर्मिता हमारे उपहास का कारण बनी हुई है. अब गंगा में डुबकी लगाने वालों के प्रति ’गंदे नालों में मस्त रहने वाले’ आदि कहने वालों की संख्या कई गुणा बढ़ चुकी है.  भाईजी, पहले वे शातिर संज्ञा का सत्यानाश करते हैं फिर उस पूरी पक्रिया पर उंगलियाँ उठाते फिरते हैं जो उस संज्ञा पर आश्रित है या उससे जुड़ी हुई है.

आपने मेरे आलेख को अनुमोदित कर इस कुचक्र के विरुद्ध सधी हुई आवाज़ उठायी है.

आभार

सौरभ जी,

मकर संक्रांति पर इतने अच्छे लेख पर बधाई ! पहली बार इतनी सारी जानकारी मिली.  

सूरज के उत्तरीय या दक्षिणी गोलार्द्ध में होने से क्या प्रभाव होता है व भारत के हर प्रांत में मकर-संक्रांति किन विभिन्न नामों से जानी जाती है...आदि बातों की विस्तृत रूप में जानकारी हेतु आपका बहुत-बहुत धन्यबाद. आपको व ओ बी ओ के सभी सदस्यों को मकर-संक्रांति की ढेरों शुभकामनायें.  

आदरणीया शन्नोजी, मकर-संक्रान्ति हमारे देश का एक ऐसा पर्व है जो भाषा, क्षेत्र और मान्यताओं के परे ऋतु परिवर्तन और खगोलीय गणनाओं पर आधारित होने से सार्वभौमिक है. पर्व का नाम और इसे मनाने की परंपरा चाहे जो हो इसे मनाने में हम भारतीयों की उत्सव-प्रियता खुल कर सामने आती है. इसी तथ्य को साझा करना इस लेख का उद्येश्य है.

आपको मेरा लिखा पसंद आया, श्रम सार्थक हुआ.. . सादर

सौरभ जी, आपका बहुत धन्यबाद l मकर संक्रांति पर इस रोचक लेख को दोबारा पढ़कर बहुत ही आनंद आया l 

मकरसक्रांति के विषय में इससे अधिक सटीक और विस्तृत जानकारी कहाँ मिल सकती थी ,पोस्ट पर देर से आने का खेद है ,बचपन की कई खट्टी मीठी यादों को ताजा करी इस पोस्ट के लिए जितनी भी प्रशंसा की जाए कम होगी,सादर ,हार्दिक बधाई   

इस महत्व पूर्ण जानकारी के लिए आपको बहुत बहुत बधाई हो 

आज पढ़ा यह लेख आपका आदरणीय सौरभ सर | बहुत ही सुंदर और सरल तरीके से आपने  संक्रांत के महात्म्य को समझाया है | साधुवाद आदरणीय | 

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