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Pradeep Devisharan Bhatt
  • मुंबई
  • India
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Pradeep Devisharan Bhatt's Friends

  • Sheikh Shahzad Usmani
 

Pradeep Devisharan Bhatt's Page

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Sheikh Shahzad Usmani and Pradeep Devisharan Bhatt are now friends
Nov 6
Pradeep Devisharan Bhatt commented on Pradeep Devisharan Bhatt's blog post "हुक्मनामा"
"माफ़ कीजिए हुज़ूर, ऐसा कुछ भी नहीं है। व्यस्तता ज़्यादा होने के कारण मैं ओ बी ओ मैं ज़्यादा समय नहीं दे पाता हूँ, किंतु आप जैसी शख़्सियत की राय अवश्य पढ़ता हूँ। अपना कुछ भी लिखा हुआ मैं जितनी बार पढ़ता हूँ तो लगता है कि कुछ कमी रह गई है। जितना आता है ठीक…"
Oct 31
Samar kabeer commented on Pradeep Devisharan Bhatt's blog post "हुक्मनामा"
"जनाब प्रदीप भट्ट साहिब आदाब,आप ओबीओ पर सिर्फ़ ग़ज़लें पोस्ट करने आते हैं,सीखने सिखाने में आपकी रुची नहीं है, इस प्रस्तुति पर बधाई ।"
Oct 28
Pradeep Devisharan Bhatt posted blog posts
Oct 27
Pradeep Devisharan Bhatt commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post इस  बार  तेरे  शहर  में  परछाइयाँ जलीं - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"(गजल)
"very good"
Oct 25
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Pradeep Devisharan Bhatt's blog post "दीवाना "
"आ. प्रदीप जी, अच्छा प्रयास हुआ है । हार्दिक बधाई ।  तीसरा शेर बेबहर लग रहा है और इस शेर का भाव स्पष्ट नहीं हो पाया है देख लें झाँकते फ़िरते हो क्यूँ दूजों के घर। अपने घर भी आना जाना सीख लो॥"
Oct 25
Samar kabeer commented on Pradeep Devisharan Bhatt's blog post "मन मार्जियां "
"जनाब प्रदीप भट्ट साहिब आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,लेकिन ग़ज़ल बह्र और क़वाफ़ी के हिसाब से समय चाहती है,बधाई स्वीकार करें । ' जुल्म की ये इंतेहा भी कब तलक। ज़िंदगी के इम्तेह भी कब तलक॥ मतले के ऊला मिसरे में क़ाफ़िया दोष है और सानी मिसरे में…"
Oct 23
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Pradeep Devisharan Bhatt's blog post "दीवाना "
"अच्छी ग़ज़ल कही ज़नाब प्रदीप जी..बधाई"
Oct 23
Pradeep Devisharan Bhatt posted blog posts
Oct 23
Sheikh Shahzad Usmani commented on Pradeep Devisharan Bhatt's blog post आस्था "
"बेहतरीन तालीम/सबक़/प्रेरणा युक्त सृजन हेतु हार्दिक बधाई आदरणीय प्रदीप देवीशरण भट्ट साहिब। कृपया काव्य विधा का नाम व मापनीका विवरण भी देकर हम पाठकों/अभ्यर्थियों का सहयोग कीजिएगा।"
Oct 23
Pradeep Devisharan Bhatt posted a blog post

"दीवाना "

मुश्किलों में मुस्कुराना सीख लो।ज़िंदगी से दिल लगाना सीख लो ॥शौक़ पीने का तुम्हें माना मगर।  दूसरों को भी पिलाना सीख लो॥ढूँढने हैं मायने गर जीस्त के।तो राग तुम कोई पुराना सीख लो॥सत्य की है ख़ोज तुमको अगर।ख़ुद से पहले हार जाना सीख लो ॥बस में दुनियाँ तेरे भी हो जाएगी।    ख़ुद पे पहले पार पाना सीख लो॥ दूसरों की पीड़ पे ना खिलखिला।  अश्कों से दामन भिगाना सीख लो॥झाँकते फ़िरते हो क्यूँ दूजों के घर।अपने घर भी आना जाना सीख लो॥तू है गर सच्चा तो नज़रें मत घूमा।आंखो से आंखे मिलाना सीख लो॥स्वांग धरते हर बार तुम…See More
Oct 20
Samar kabeer commented on Pradeep Devisharan Bhatt's blog post "एक शहर का दु:ख"
"जनाब प्रदीप भट्ट साहिब आदाब,नज़्म का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें । कुछ बातें आपकी जानकारी में लाना चाहूँगा । सहीह शब्द--,"शह्र-क़ह्र--अम्न--मन्दिर हैं देखियेगा । 'के सरहद के उस पार का है कलंदर' इस पंक्ति…"
Oct 14
V.M.''vrishty'' commented on Pradeep Devisharan Bhatt's blog post "एक शहर का दु:ख"
"आदरणीय प्रदीप जी, अभिवादन! समसामयिक एवं सत्य को उजागर करती बेहतरीन कविता। बहुत बधाई!"
Oct 13
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on Pradeep Devisharan Bhatt's blog post "एक शहर का दु:ख"
"आद0 प्रदीप भट्ट जी सादर अभिवादन। बढिया कविता लिखी आपने। बधाई स्वीकार कीजिये।"
Oct 13
Pradeep Devisharan Bhatt posted blog posts
Oct 12

Profile Information

Gender
Male
City State
Mumbai
Native Place
Roorkie
Profession
Government
About me
Superintendent in KVIC, Mumbai

Pradeep Devisharan Bhatt's Blog

"हुक्मनामा"

 

हिम्मत है तो मुझसे आकर द्वंद करो।

वरना यूँ अनर्गल प्रलाप को बंद करो॥

 

छोरे छोरी में जो भेद करे ऐसे।  

गाँव की सगरी ऐसी खाप को बंद करो॥…

Continue

Posted on October 27, 2018 at 2:00pm — 2 Comments

"मन मार्जियां "

जुल्म की ये इंतेहा भी कब तलक।

ज़िंदगी के इम्तेहा भी कब तलक॥

आज़ या कल बिखर ही जाऊंगा।

वक़्त होगा मेहरबाँ भी कब तलक॥

ऐब ही जब ऐब तुझमें हैं भरे मैं ।

तुझमें ढूँडू ख़ूबियाँ भी कब तलक॥…

Continue

Posted on October 23, 2018 at 11:30am — 1 Comment

आस्था "

हर घर में एक राम है रहता।

हर घर में एक रावण भी॥

जैसी जिसकी सोच है रहती।

उसको दिखता वो वैसा ही॥

 

टूट शिला से छोटा टुकड़ा।

लुढ़क रहा मंदिर की ओर॥

कोई देखता उसको पत्थर।

कोई देखता भगवन को॥

 

आस्था और विश्वास जहां हो।

तर्क नहीं देते कुछ काम॥

मानो या न मानो लेकिन।

बनते सबके बिगड़े काम॥

 

धर्म-अधर्म सब अंदर अपने।

पीर पड़े लगे राम को जपने॥

वर्षो से यही रीत चल रही।

इच्छाओं की गति…

Continue

Posted on October 22, 2018 at 5:30pm — 1 Comment

"दीवाना "

मुश्किलों में मुस्कुराना सीख लो।

ज़िंदगी से दिल लगाना सीख लो ॥

शौक़ पीने का तुम्हें माना मगर।  

दूसरों को भी पिलाना सीख लो॥

ढूँढने हैं मायने गर जीस्त के।

तो राग तुम कोई पुराना सीख लो॥…

Continue

Posted on October 20, 2018 at 5:30pm — 2 Comments

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