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Pradeep Devisharan Bhatt
  • मुंबई
  • India
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Pradeep Devisharan Bhatt's Page

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डॉ छोटेलाल सिंह commented on Pradeep Devisharan Bhatt's blog post "तारतम्यता"
"उम्दा भाव के साथ सुंदर सृजन का प्रयास किया है आदरणीय दिली बधाई"
11 minutes ago
vijay nikore commented on Pradeep Devisharan Bhatt's blog post "तारतम्यता"
"आपकी कविता अच्छी लगी। हार्दिक बधाई, आदरणीय प्र्दीप जी ।"
Monday
Sheikh Shahzad Usmani commented on Pradeep Devisharan Bhatt's blog post "तारतम्यता"
" सबक़ देती बहुत बढ़िया छंदमुक्त रचना। हार्दिक बधाई आदरणीय प्रदीप देवीशरण भट्ट साहिब।"
Friday
Pradeep Devisharan Bhatt posted blog posts
Friday
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Pradeep Devisharan Bhatt's blog post "तारतम्यता"
"भावपक्ष ठीक लगा मुझे आपकी कविता में..बाकी तो विद्वान ही बता सकेंगे.."
Friday
Pradeep Devisharan Bhatt posted a blog post

"तारतम्यता"

                                      तुम या तो बन जाओ किसी के,या उसको अपना बना के देखो,जीवन महकेगा फूलों सा,प्रेम सुधा  तुम पीकर देखो ।।क्या खोया है क्या पाया है,इससे ध्यान हटाकर देखो,तुमकों पाना आयामों को तो , नित-नए अनुभव कर के देखो।।चाहे जितनी दूर हो मंजिल,स्वत: निकट आने लगती है,द्रढ़ता से आकाश भी झुकता,बस एक कदम बढाकर देखो।।ज्यों ज्यों काली रात ढलेगी,उतनी सुंदर सुबह मिलेगी,कुंदन सा चमकेगा जीवन.इसको बस थोड़ा तपाकर देखो।।लक्ष्यहीन जीवन नश्वर है,जल के बिन जैसे सागर है,हिमालय के मस्तक जैसा,जीवन…See More
Sep 20
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Pradeep Devisharan Bhatt's blog post मुंबई मेरी जान
"इस मंच पे आप बहुत कुछ सीख सकते हैं...आदरणीय समर जी की बात का संज्ञान लें.."
Sep 18
Samar kabeer commented on Pradeep Devisharan Bhatt's blog post मुंबई मेरी जान
"जनाब प्रदीप भट्ट साहिब आदाब,अगर ये ग़ज़ल है, तो बहुत समय चाहती है,क्योंकि इसमें रदीफ़ तो है लेकिन बह्र और क़वाफ़ी नदारद हैं ,बहरहाल इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
Sep 14
Pradeep Devisharan Bhatt posted a blog post

मुंबई मेरी जान

सबके लिए है कुछ न कुछ, मुंबई मे ज़रूर ।एक बार सही मुंबई में बस आइए ज़रूर॥ निर्विघ्न हो जब हाथ है सर पे विघ्नहर्ता का।श्रद्धा तू रख ये होंगे सिद्ध एक दिन ज़रूर।। खाली नहीं लौटा है बशर, हाजी-अली से।नीयत अगर है साफ, तो रहमत मिले ज़रूर॥ रुकती नहीं ये भागती, रहती है रात-दिन ।मिल जाएगा तुझको भी, तेरा हमसफर ज़रूर।। सपनों की नगरी करती है अहतराम सभी का ।जिसमें हो फ़न बन जाएगा फनकार भी ज़रूर।।   होकर उदास इस तरह, बैठो नहीं ‘प्रदीप’किस्मत अगर है साथ तो, मंजिल मिले ज़रूर-प्रदीप भट्ट- “रचना मौलिक एवं अप्रकाशित है” See More
Sep 13
Pradeep Devisharan Bhatt commented on Samar kabeer's blog post 'निलेश जी की ज़मीन में एक ग़ज़ल'
"जनाब कबीर साहब, प्रणाम, आप लोगों के  सान्निध्य में  रहकर कुछ सीखने का प्रयास कर रहा हूँ। इस अज़ीम ग्रुप को जॉइन करने का यह भी एक कारण है।"
Sep 4
Samar kabeer commented on Pradeep Devisharan Bhatt's blog post "तमाशा"
"जनाब प्रदीप भट्ट साहिब आदाब,प्रयास अच्छा है,लेकिन अभी बह्र, शिल्प,और क़वाफ़ी पर समय देना होगा,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
Sep 2
Pradeep Devisharan Bhatt posted blog posts
Sep 1
Pradeep Devisharan Bhatt commented on Pradeep Devisharan Bhatt's blog post जीने की चाह
"धन्यवाद जनाब "
Sep 1
Samar kabeer commented on Pradeep Devisharan Bhatt's blog post जीने की चाह
"जनाब प्रदीप भट्ट साहिब आदाब,अच्छी कविता हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
Sep 1
Samar kabeer commented on Pradeep Devisharan Bhatt's blog post जीवन की धमाचौकड़ी
"जनाब प्रदीप भट्ट साहिब आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,लेकिन अभी समय चाहता है,ग़ज़ल सीखने के लिये ओबीओ पर समूह "ग़ज़ल की कक्षा" का लाभ लें,इस प्रयास के लिये बधाई स्वीकार करें ।"
Aug 27
Pradeep Devisharan Bhatt posted a blog post

जीवन की धमाचौकड़ी

जीवन की धमाचौकड़ी में वो अस्त-व्यस्त था।मिलता तो था सभी से मगर ज़्यादा व्यस्त था।। हर चंद कोशिशें थीं  कि दीदार-ए-यार  हो।पहरा मगर महल में बहुत ज़्यादा सख्त था।। कहने को गर हैं भाई फिर मैदान-ए-जंग में।गिरता था ज़मीन पे वो फिर किसका रक्त था।। गर सब हैं बेगुनाह तो चल अब तू ही दे बता।खंज़र मेरे शरीर में वो किसका पेवस्त था।। जिससे भी जुड़ा रिश्ते में वो बंधता चला गया।बस उसका ही मिजाज थोड़ा ज़्यादा सख़्त था।। हर जंग जीतकर वो कहलाया था सिकंदर।पोरस से जब मिला तो हौसला उसका पस्त था उस पर ‘प्रदीप’ कोई भी मुसीबत…See More
Aug 24

Profile Information

Gender
Male
City State
Mumbai
Native Place
Roorkie
Profession
Government
About me
Superintendent in KVIC, Mumbai

Pradeep Devisharan Bhatt's Blog

"तारतम्यता"

                                      

तुम या तो बन जाओ किसी के,

या उसको अपना बना के देखो,

जीवन महकेगा फूलों सा,

प्रेम सुधा  तुम पीकर देखो ।।

क्या खोया है क्या पाया…

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Posted on September 19, 2018 at 6:00pm — 4 Comments

मुंबई मेरी जान

सबके लिए है कुछ न कुछ, मुंबई मे ज़रूर ।

एक बार सही मुंबई में बस आइए ज़रूर॥

 

निर्विघ्न हो जब हाथ है सर पे विघ्नहर्ता का।

श्रद्धा तू रख ये होंगे सिद्ध एक दिन ज़रूर।।

 

खाली नहीं लौटा है बशर, हाजी-अली…

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Posted on September 13, 2018 at 12:00pm — 2 Comments

"तमाशा"

पल में तोला है पल में माशा है

ये ज़िन्दगी है या एक तमाशा है

 

मय को पीकर इधर उधर गिरना

ये मयकशी है या एक तमाशा है

 

दब गए बोल सारे साज़ों में

ये मौसिक़ी है या एक तमाशा है

 

दिख रहे ख़ुश बिना तब्बसुम के 

ये ख़ुशी है या एक तमाशा है

 

इश्क़ को कर रहा रुसवा कबसे     

ये आशिक़ी है या एक तमाशा है

 

दरिया में रह के नीर की चाहत

ये तिश्नगी है या एक तमाशा है

 

तू जल रहा फिर…

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Posted on September 1, 2018 at 1:14pm — 1 Comment

जीने की चाह

चाह जीने की अगर, तुझमें पनपती है प्रबल,

रास्ता रोकेगा कैसे, फिर तुम्हारा दावानल ।

चाहे जितनी मुश्किलें, आयें तुम्हारे सामने,

तुम कभी करना नहीं, अपनों नयनों को सज़ल ।

जिंदगी के रास्ते, इतने सरल होते नहीं,

तुझको भी पीना पड़ेगा,अपने हिस्से का गरल ।

तू अगर सच्चा है तो फिर, डर तुझे किस बात का,

मंजिलों की जुस्तज़ू में, हौसले लेकर निकल ।

कर नहीं पायेगी तुझको, कोई भी मुश्किल विकल,

गर इरादे होंगे तेरे, आसमां…

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Posted on August 31, 2018 at 5:30pm — 2 Comments

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