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Usha Awasthi
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Usha Awasthi replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-138
"आ0 प्रतिभा पाण्डे जी, आपको  रचना भाव, शिल्प तथा प्रदत्त विषय को संतुष्ट करती लगी, जानकर अत्यन्त हर्ष हुआ। हार्दिक आभार आपका,सादर।"
Apr 18
Usha Awasthi replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-138
"आ0 चेतन प्रकाश जी, नमन। मैंने पटल पर कई बार देखा, इस विषय पर कोई रचना नहीं थी। ज्ञात हुआ, कोई तकनीकी समस्या थी। मैंने उसी 'वक़्त' लिख कर डाला और रचना पटल पर चली भी गई। रचना अच्छी लगने हेतु हार्दिक धन्यवाद आपका।"
Apr 18
Usha Awasthi replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-138
"वक़्त पुराना और था आज वक़्त कुछ और ढूँढे आज विदेश में रोज़ी रोटी , ठौर छोड़ दिया माँ- बाप को उनको,उनके हाल चाहें ख़ुद औलाद से रक्खे उनका ख़्याल विकसित करते देश नित नव संहारक अस्त्र दो मुल्कों के युद्ध में होता मानव त्रस्त हुआ विनाश विवेक का इक…"
Apr 17
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post वसन्त (अतुकान्त )
"आदरणीय सुशील सरन जी, सुझाव हेतु हार्दिक धन्यवाद"
Apr 13
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post वसन्त (अतुकान्त )
"आदरणीय पंकज कुमार जी, प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक आभार आपका।"
Apr 13
Sushil Sarna commented on Usha Awasthi's blog post वसन्त (अतुकान्त )
"आदरणीया जी निस्संदेह आपका सृजन भावपूर्ण और सार्थक है । आदरणीय समर कबीर जी की टिप्पणी से मैं सहमत हूँ । यह वस्तुतः अतुकांत शैली न होकर दोहा शैली है जिसके नियमों का निर्वाह आवश्यक है । सादर नमन"
Apr 12
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on Usha Awasthi's blog post वसन्त (अतुकान्त )
"आदरणीय सादर प्रणाम आपकी रचना निःसन्देह दोहा छन्द आधारित है। सभी दोहे भावात्मक दृष्टि से ठीक हैं...मात्र आपको मात्रा गणना पर ध्यान देना होगा और ध्यान दिया जाना आवश्यक भी है, क्योंकि आप रचना कर रही हैं अतः रचना मानकानुरूप होनी ही चाहिये। शुभम भवतु"
Apr 7
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post वसन्त (अतुकान्त )
"आदरणीय समर कबीर जी ,आदाब। सच तो यह है कि जैसे भाव आते हैं ,मैं वैसे ही लिख देती हूँ। मात्राओं की गिनती नहीं करती। लय का अवश्य ध्यान रहता है।इसी कारण अतुकान्त लिख दिया।आपकी प्रतिक्रिया पाकर हर्ष हुआ। हार्दिक धन्यवाद आपका"
Apr 6
Samar kabeer commented on Usha Awasthi's blog post वसन्त (अतुकान्त )
"मुह्तरमा  ऊषा अवस्थी जी आदाब, आपकी ये प्रस्तुति तो दोहों की है,आप इसे अतुकांत क्यों लिख रही हैं ? इसुन्द्र प्रस्तुति हुई है ,बधाई स्वीकार करें I "
Apr 6
Usha Awasthi posted a blog post

वसन्त (अतुकान्त )

पतझड़ हुआ विराग काखिले मिलन के फूलप्रेम, त्याग, आनन्द कीचली पवन अनुकूलचिन्ता, भय,और शोक का मिटा शीत अवसादशान्ति, धैर्य, सन्तोष संग प्रकटा प्रेम प्रसादसरस नेह सरसों खिली अन्तर भरे उमंगपीत वसन की ओढ़नी, थिर सब हुईं तरंगशिव शक्ती का यह मिलन,अद्भुत, अगम, अनन्तगति मति अविचल,अपरिमित, अव्याख्येय वसन्तमौलिक एवं अप्रकाशितSee More
Apr 6
Usha Awasthi commented on Samar kabeer's blog post ओबीओ की बारहवीं सालगिरह का तुहफ़ा
"इस खूबसूरत ग़ज़ल हेतु आ0 समर कबीर जी को बहुत-बहुत बधाई एवं ओ बी ओ ऑनलाइन की बारहवीं सालगिरह पर इससे जुड़े सभी सदस्यों का हार्दिक आभार।नवसंवत्सर मंगलमय हो।"
Apr 3
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post होली
"आ0 सुरेन्द्र कुमार शुक्ला जी, प्रस्तुति सुन्दर लगने हेतु हार्दिक धन्यवाद।शुभकामनाएँ "
Mar 24
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post चन्द्र
"आ0 सुरेन्द्र कुमार  शुक्ला जी, हार्दिक आभार आपका,जय श्री राधे"
Mar 24
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Mar 24
SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR commented on Usha Awasthi's blog post चन्द्र
"वाह बहुत सुन्दर भाव , जय श्री राधे"
Mar 24
Usha Awasthi shared their blog post on Facebook
Mar 24

Profile Information

Gender
Female
City State
Lucknow
Native Place
Uttar Pradesh
Profession
Author

ब्राहम्ण

उषा अवस्थी

मान दिया होता यदि तुमने
ब्राम्हण को , सुविचारों को
सदगुण की तलवार काटती
निर्लज्जी व्यभिचारों को

उसको काया मत समझो ,
ज्ञान विज्ञान समन्वय है
द्वैत भाव से मुक्त, जितेन्द्रिय
सत्यप्रतिज्ञ , समुच्चय है

कर्म , वचन , मन से पावन
वह ब्रम्हपथी , समदर्शी है
नहीं जन्म से , सतत कर्म से
तेजस्वी , ब्रम्हर्षि है

मौलिक एवं अप्रकाशित

Usha Awasthi's Blog

वसन्त (अतुकान्त )

पतझड़ हुआ विराग का
खिले मिलन के फूल
प्रेम, त्याग, आनन्द की
चली पवन अनुकूल
चिन्ता, भय,और शोक का
मिटा शीत अवसाद
शान्ति, धैर्य, सन्तोष संग
प्रकटा प्रेम प्रसाद
सरस नेह सरसों खिली
अन्तर भरे उमंग
पीत वसन की ओढ़नी,
थिर सब हुईं तरंग
शिव शक्ती का यह मिलन,
अद्भुत, अगम, अनन्त
गति मति अविचल,अपरिमित,
अव्याख्येय वसन्त

मौलिक एवं अप्रकाशित

Posted on April 6, 2022 at 12:37pm — 6 Comments

चन्द्र

विरहणी; भाई ,पति का

संदेश तुम्ही से कहती थी

अपने भावों को पहुँचाने

तुम्हे निहोरा करती थी



स्वर्ण रश्मियों की डोरी से

चन्द्र उतर कर तुम आते

तपते मन के ज़ख़्मों पर…

Continue

Posted on March 24, 2022 at 11:05am — 2 Comments

होली

मन की कारिख धोई कै,  प्रेम रंग चटकाय

मोद सरोवर  डूबिए, काम, क्रोध विलगाय



पाप ताप की होलिका जब जारै कोई बुद्ध

प्रकटै तब आह्लाद संग नित्य, मुक्त जो शुद्ध



ज्ञानाग्नि में दहन कर , सभी शुभ अशुभ कर्म

होली हो वैराग्य की, जाने सत का…

Continue

Posted on March 16, 2022 at 11:50pm — 8 Comments

साल पचहत्तर बाद

कैसे अपने देश की
नाव लगेगी पार?
पढ़ा रहे हैं जब सबक़
राजनीति के घाघ

जिनके हाथ भविष्य की
नाव और पतवार
वे युवजन हैं सीखते
गाली के अम्बार

अपने को कविवर समझ
वाणी में विष घोल
मानें बुध वह स्वयं को
उनके बिगड़े बोल

वेद , पुराण, उपनिषद
सत्य सनातन भाष्य
समझ सके न आज भी

साल पचहत्तर बाद

मौलिक एवं अप्रकाशित

Posted on January 24, 2022 at 10:18am — 4 Comments

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At 6:29am on August 5, 2018, Kishorekant said…

सुन्दर रचना केलिये हार्दिक अभिनंदन सुश्री उषा अवस्थिजी ।

At 9:01pm on September 9, 2017,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए....

 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

भारतीय छंद विधान से सम्बंधित जानकारी  यहाँ उपलब्ध है.

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