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Usha Awasthi
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Usha Awasthi replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-111
"मेरा मनोबल बढ़ाने हेतुआप सभी को हार्दिक धन्यवाद"
Jan 12
Usha Awasthi replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-111
"सारा जगत प्रपंच है माया का भ्रमजाल चौरासी का पाश यह जन्म-जन्म का काल क्यों फंसता इस चक्र में अन्तर लोचन खोल पाएगा अनिवर्चनीय नित आनन्द अमोल मौलिक एवं अप्रकाशित"
Jan 12
Usha Awasthi replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-111
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Jan 12
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post कविता : चलो, विश्वास भरें
"आप सभी को हार्दिक धन्यवाद"
Jan 9
vijay nikore commented on Usha Awasthi's blog post कविता : चलो, विश्वास भरें
"रचना अच्छी बनी है। बधाई आ० ऊषा जी।"
Jan 7
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on Usha Awasthi's blog post कविता : चलो, विश्वास भरें
"आद0 उषा जी सादर अभिवादन। नववर्ष पर सकारात्मक सोच को परिलक्षित करती उम्दा रचना पर बधाई स्वीकार कीजिए।"
Jan 4
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Usha Awasthi's blog post कविता : चलो, विश्वास भरें
"आ. ऊषा जी, सादर अभिवादन। नववर्ष पर सकारात्मक सोच फैलाती सुंदर रचना हुई है । हार्दिक बधाई।"
Jan 3
आशीष यादव commented on Usha Awasthi's blog post कविता : चलो, विश्वास भरें
"नये वर्ष मे नई प्रेरणा प्रदान करती हुई सुन्दर रचना। बधाई।"
Jan 2
Usha Awasthi shared their blog post on Facebook
Jan 1
Usha Awasthi posted a blog post

कविता : चलो, विश्वास भरें

चलो, विश्वास भरेंगया पुरातन वर्षनवीन विचार करेंआपस के सब मनमुटाव कर दूर चलो, विश्वास भरेंबैर भाव से हुए प्रदूषितजो मन, बुद्धि , धारणाएँज्ञानाग्नि से , सर्व कलुष कर दग्धसभी संत्रास हरेंआपस के सब मनमुटाव कर दूर चलो, विश्वास भरेंहै अनेकता में सुन्दर एकत्वउसे अनुभूति करेंकर संशय, भ्रम दूरनेह, सतभाव वरेंआपस के सब मनमुटाव कर दूरचलो, विश्वास भरेंसभी धर्म सदग्रन्थों के जोशुभ, सुचार , संदेश ;बना आधार, करें आचारन हम अहमन्य धरेंआपस के सब मनमुटाव कर दूरचलो, विश्वास भरें ।(मौलिक एवं अप्रकाशित) See More
Jan 1
Usha Awasthi shared Admin's discussion on MySpace
Dec 14, 2019
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post धुआँ-धुआँ क्यों है?
"आप सभी का हार्दिक आभार"
Dec 2, 2019
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on Usha Awasthi's blog post धुआँ-धुआँ क्यों है?
"आद0 उषा अवस्थी जी सादर अभिवादन। समसामयिक विषय पर अच्छी रचना की है आपने। आद0 समर साहब की बातों का संज्ञान लीजिये। रचना पर बधाई स्वीकार कीजिये।"
Nov 28, 2019
Samar kabeer commented on Usha Awasthi's blog post धुआँ-धुआँ क्यों है?
"मुहतरमा ऊषा अवस्थी जी आदाब,रचना का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें । सुबू शाम बुझा-बुझा क्यों है इस पंक्ति में 'सुब्ह' को "सुबू" लिखना उचित नहीं है । 'बीमारियों की फ़िज़ा क्यों है' इस पंक्ति में सहीह शब्द है…"
Nov 25, 2019
Usha Awasthi posted a blog post

धुआँ-धुआँ क्यों है?

ये आसमां धुआँ-धुआँ क्यों है? सुबू शाम बुझा-बुझा क्यों है? इन्सां बाहर निकलने से डर रहा है बीमारियों की फ़िज़ा क्यों है?यह सारा किया उसी ने है ज़हर फैलाया उसी ने है बेजान इमारतों के ख़ातिर वृक्षों को गिराया उसी ने हैकितने अपशिष्ट जलाए उसने? कितने कारखाने चलाए उसने? क्या उसे नहीं पता ? इतनी बद्दुआएँ क्यों हैं?ये आसमां धुआँ-धुआँ क्यों है?मौलिक एवं अप्रकाशितSee More
Nov 21, 2019

Profile Information

Gender
Female
City State
Lucknow
Native Place
Uttar Pradesh
Profession
Author

ब्राहम्ण

उषा अवस्थी

मान दिया होता यदि तुमने
ब्राम्हण को , सुविचारों को
सदगुण की तलवार काटती
निर्लज्जी व्यभिचारों को

उसको काया मत समझो ,
ज्ञान विज्ञान समन्वय है
द्वैत भाव से मुक्त, जितेन्द्रिय
सत्यप्रतिज्ञ , समुच्चय है

कर्म , वचन , मन से पावन
वह ब्रम्हपथी , समदर्शी है
नहीं जन्म से , सतत कर्म से
तेजस्वी , ब्रम्हर्षि है

मौलिक एवं अप्रकाशित

Usha Awasthi's Blog

कविता : चलो, विश्वास भरें

चलो, विश्वास भरें

गया पुरातन वर्ष

नवीन विचार करें

आपस के सब मनमुटाव कर दूर 

चलो, विश्वास भरें

बैर भाव से हुए प्रदूषित

जो मन, बुद्धि , धारणाएँ

ज्ञानाग्नि से , सर्व कलुष कर दग्ध

सभी संत्रास हरें

आपस के सब मनमुटाव कर दूर 

चलो, विश्वास भरें

है अनेकता में सुन्दर एकत्व

उसे अनुभूति करें

कर संशय, भ्रम दूर

नेह, सतभाव वरें

आपस के सब मनमुटाव कर दूर

चलो,…

Continue

Posted on January 1, 2020 at 9:12pm — 5 Comments

धुआँ-धुआँ क्यों है?

ये आसमां धुआँ-धुआँ क्यों है?
सुबू शाम बुझा-बुझा क्यों है?
इन्सां बाहर निकलने से डर रहा है
बीमारियों की फ़िज़ा क्यों है?

यह सारा किया उसी ने है
ज़हर फैलाया उसी ने है
बेजान इमारतों के ख़ातिर
वृक्षों को गिराया उसी ने है

कितने अपशिष्ट जलाए उसने?
कितने कारखाने चलाए उसने?
क्या उसे नहीं पता ?
इतनी बद्दुआएँ क्यों हैं?

ये आसमां धुआँ-धुआँ क्यों है?

मौलिक एवं अप्रकाशित

Posted on November 21, 2019 at 11:30am — 3 Comments

किस्से हैं, कहानी है

किस्से हैं , कहानी है

दुनिया अनजानी है

कोई कब आएगा ?

कोई कब जाएगा ?

कौन जानता भला ?

केवल रवानी है

किस्से हैं - -

अभी तो यहीं था

कैसे चला गया ?

बार-बार दोहराती

बात पुरानी है

किस्से हैं - -

ख़ाली ही आया धा

ख़ाली विदा हुआ

बार -बार पाने की

ज़िद , दीवानी है

किस्से हैं - -

निर्मोही देह में

मोह पोसा गया

पाया न मनभाया

नित- नित कोसा गया

फिर…

Continue

Posted on October 12, 2019 at 9:00pm — 2 Comments

वे ही सन्त होते हैं

करो कितना विवेचन

शैलियों , पांडित्य का, लेकिन

भावों के धरातल पर ही

गौतम बुद्ध बनते हैं

हुए तर्कों , वितर्कों से परे

वे शुद्ध हो गए

प्रकृति के सब प्रपंचों से 

निरुद्ध , प्रबुद्ध हो गए

जो खेलें दूसरों की गरिमा से

उन्मत्त होते हैं

सदा जो प्रेम से भरपूर

वे ही सन्त होते हैं

मौलिक एवं अप्रकाशित

Posted on September 18, 2019 at 10:30pm — 1 Comment

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At 9:12am on November 21, 2018, Ahmed Maris said…

Good Day,
How is everything with you, I picked interest on you after going through your short profile and deemed it necessary to write you immediately. I have something very vital to disclose to you, but I found it difficult to express myself here, since it's a public site.Could you please get back to me on:( mrsstellakhalil5888@gmail.com ) for the full details.

Have a nice day
Thanks God bless.
Stella.

At 6:29am on August 5, 2018, Kishorekant said…

सुन्दर रचना केलिये हार्दिक अभिनंदन सुश्री उषा अवस्थिजी ।

At 9:01pm on September 9, 2017,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए....

 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

भारतीय छंद विधान से सम्बंधित जानकारी  यहाँ उपलब्ध है.

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