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Usha Awasthi
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Samar kabeer commented on Usha Awasthi's blog post रिश्ते तो कपड़े हैं
"//जनाब मुहम्मद आरिफ साहब, आप ख़ुलेआम (श्रीमती उषा अवस्थी जी, जोकि एक वरिष्ठ नागरिक हैं) को अपमानित कर रहे हैं. एक बुजुर्ग महिला, हरेक नाम के साथ आदरणीय जोड़कर लिखेगी तो अटपटा नहीं लगेगा? वे सब नामों के आगे 'जी' लगाकर संबोधित कर रही हैं.…"
Oct 10
Vinita Shukla commented on Usha Awasthi's blog post रिश्ते तो कपड़े हैं
"जनाब मुहम्मद आरिफ साहब, आप ख़ुलेआम (श्रीमती उषा अवस्थी जी, जोकि एक वरिष्ठ नागरिक हैं) को अपमानित कर रहे हैं. एक बुजुर्ग महिला, हरेक नाम के साथ आदरणीय जोड़कर लिखेगी तो अटपटा नहीं लगेगा? वे सब नामों के आगे 'जी' लगाकर संबोधित कर रही हैं. क्या…"
Oct 9
Mohammed Arif commented on Usha Awasthi's blog post रिश्ते तो कपड़े हैं
"आदरणीया उषा अवस्थी जी आदाब,                                      ओबीओ साहित्य का एक लब्ध प्रतिष्ठ मंच है । इस मंच पर बहुत ही सम्मान और गरिमा का ध्यान दिया…"
Oct 9
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post रिश्ते तो कपड़े हैं
"समर कबीर जी, हर बात हरेक पर लागू नहीं होती,धन्यवाद।"
Oct 8
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post रिश्ते तो कपड़े हैं
"नीलम उपाध्याय जी, धन्यवाद।"
Oct 8
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post रिश्ते तो कपड़े हैं
"मोहम्मद आरिफ जी, शुक्रिया।"
Oct 8
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post रिश्ते तो कपड़े हैं
"मोहम्मद आरिफ जी, शुक्रियि।"
Oct 8
Usha Awasthi joined Admin's group
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धार्मिक साहित्य

इस ग्रुप मे धार्मिक साहित्य और धर्म से सम्बंधित बाते लिखी जा सकती है,See More
Oct 7
डॉ छोटेलाल सिंह replied to Usha Awasthi's discussion बाल कविता in the group बाल साहित्य
"बहुत ही सुंदर बाल कविता बधाई हो आदरणीया ऊषा अवस्थी जी "
Sep 26
Usha Awasthi updated their profile
Sep 7
Usha Awasthi replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-94
"उषा अवस्थी रिमझिम-रिमझिम बदरा बरसे (अजहूँ न आए पिया रे)2 (ये बदरा कारे कजरारे बार-बार आ जाएँ दुआरे)2 घर आँगन सब सूना पड़ा रे सूनी सेजरिया रे रिमझिम - - - - (तन मन ऐसी अगन लगाए जो बदरा से बुझे न बुझाए)2 अब तो अगन बुझे तबहीं जब आएँ साँवरिया रे रिमझिम -…"
Aug 11
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post प्राचीन गुरुकुल
"धन्यवाद"
Aug 7
babitagupta commented on Usha Awasthi's blog post प्राचीन गुरुकुल
"गुरूकुल की अहमियत को दर्शाती रचना, हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिएगा आदरणीया ऊषा दी।"
Aug 6
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Usha Awasthi's blog post प्राचीन गुरुकुल
"बेहतरीन रचना । हार्दिक बधाई , आदरणीया.."
Aug 6
Neelam Upadhyaya commented on Usha Awasthi's blog post प्राचीन गुरुकुल
"आदरणीया उषा अवस्थी  जी, अच्छी रचना की प्रस्तुति के लिए बधाई। "
Aug 6
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post प्राचीन गुरुकुल
"आदाब, शुक्रिया"
Aug 5

Profile Information

Gender
Female
City State
Lucknow
Native Place
Uttar Pradesh
Profession
Author

ब्राहम्ण

उषा अवस्थी

मान दिया होता यदि तुमने
ब्राम्हण को , सुविचारों को
सदगुण की तलवार काटती
निर्लज्जी व्यभिचारों को

उसको काया मत समझो ,
ज्ञान विज्ञान समन्वय है
द्वैत भाव से मुक्त, जितेन्द्रिय
सत्यप्रतिज्ञ , समुच्चय है

कर्म , वचन , मन से पावन
वह ब्रम्हपथी , समदर्शी है
नहीं जन्म से , सतत कर्म से
तेजस्वी , ब्रम्हर्षि है

मौलिक एवं अप्रकाशित

Usha Awasthi's Blog

आधुनिक शिक्षा संस्थान

शिक्षा संस्थाओं के
हाल आज और हैं
छात्र यूनियनों में
लड़ाई  के दौर हैं

शिक्षालय आज 
राजनीति के अड्डे हैं
कमाई,चुनाव के
थ॓धों पर थंधे हैं

फैली अराजकता
अलग -अलग झंडे हैं
परिसर में घूमते
दलालों के पंडे हैं


मौलिक एवं अप्रकाशित

Posted on August 4, 2018 at 10:30am

प्राचीन गुरुकुल

पूर्णतया शिक्षा को गुरू समर्पित थे

कंद,मूल,फल,बिना जोता अन्न खाते थे

पठन -पाठन को समय बचाते थे

तभी तो गुरुजन श्रृषि कहलाते थे



गुरुकुल के प्राँगण में व्यर्थ वाद वर्जित था

गुरू ज्ञान-धारा से हर छात्र सिंचित था

चरणों में उनके नतमस्तक हो जाते थे

तभी तो गुरुजन श्रृषि कहलाते थे



राजा उनसे मिलने गुरुगृह जब जाते थे

आयुध अपने बाहर रख अन्दर आते थे

उलझनें शासन की,उन स॔ग सुलझाते थे

तभी तो गुरुजन श्रृषि कहलाते थे



मौलिक एव॔…

Continue

Posted on August 4, 2018 at 10:30am — 8 Comments

जरा धीरे चलो

जिन्दगी थोड़ा ठहर जाओ
जरा धीरे चलो
तेज इस रफ्तार से 
घात से प्रतिघात से 
वक्त रहते , सम्भल जाओ
जरा धीरे चलो
जिन्दगी - - - -
कामना के ज्वार में
मान के अधिभार में
डूबने से बच , उबर जाओ
जरा धीरे चलो
जिन्दगी - - - -
शब्दाडम्बरों के
उत्तरों प्रत्युत्तरों के
जाल से बच कर , निकल जाओ 
जरा धीरे चलो
जिन्दगी - - - -

(मौलिक एवम अप्रकाशित)

Posted on June 12, 2018 at 10:27pm — 11 Comments

कितने रोगों से बच जाते

जब कागज के ये रुपये

सुन्दर सिक्कों में ढल जाते

तब सचमुच अच्छा होता

कितने रोगों से बच जाते



कम से कम गंदे नोटों को

हमें नहीं छूना पड़ता

जिनमें गुटखा पीक लगा हो

और हिसाब लिखा चुभता



तभी पुराने महाराजे

सुन्दर सिक्के गढ़वाते थे

जो भी हो , गंदे सिक्के

पानी  से तो धुल जाते थे

सिक्कों की प्राचीन प्रथा

सचमुच में कितनी अच्छी थी

स्वस्थ रहे जनता अपनी

यह सुभग भावना सच्ची…

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Posted on May 21, 2018 at 7:30pm — 2 Comments

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At 6:29am on August 5, 2018, Kishorekant said…

सुन्दर रचना केलिये हार्दिक अभिनंदन सुश्री उषा अवस्थिजी ।

At 9:01pm on September 9, 2017,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए....

 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

भारतीय छंद विधान से सम्बंधित जानकारी  यहाँ उपलब्ध है.

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