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Usha Awasthi
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Usha Awasthi replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-94
"उषा अवस्थी रिमझिम-रिमझिम बदरा बरसे (अजहूँ न आए पिया रे)2 (ये बदरा कारे कजरारे बार-बार आ जाएँ दुआरे)2 घर आँगन सब सूना पड़ा रे सूनी सेजरिया रे रिमझिम - - - - (तन मन ऐसी अगन लगाए जो बदरा से बुझे न बुझाए)2 अब तो अगन बुझे तबहीं जब आएँ साँवरिया रे रिमझिम -…"
Saturday
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post प्राचीन गुरुकुल
"धन्यवाद"
Aug 7
babitagupta commented on Usha Awasthi's blog post प्राचीन गुरुकुल
"गुरूकुल की अहमियत को दर्शाती रचना, हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिएगा आदरणीया ऊषा दी।"
Aug 6
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Usha Awasthi's blog post प्राचीन गुरुकुल
"बेहतरीन रचना । हार्दिक बधाई , आदरणीया.."
Aug 6
Neelam Upadhyaya commented on Usha Awasthi's blog post प्राचीन गुरुकुल
"आदरणीया उषा अवस्थी  जी, अच्छी रचना की प्रस्तुति के लिए बधाई। "
Aug 6
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post प्राचीन गुरुकुल
"आदाब, शुक्रिया"
Aug 5
Usha Awasthi left a comment for Kishorekant
"आभार आपका"
Aug 5
Usha Awasthi added a discussion to the group बाल साहित्य
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बाल कविता

फूल खिले जो बगिया मेंवह कितने सुन्दर लगते हैंलाल ,गुलाबी,नीले,पीलेमन खुशियों से भरते हैंतितली उड़ती रंग-बिरंगीफूलों पर है इधर-उधरभँवरे भी गुँजन करतेउन पर मंडराने लगते हैंचूँ-चूँ करती चिड़ियाँ भीआकर डाली पर खेल रहींइस डाली से उस डाली परउड़ कर झूला झूल रहींहाथ बढ़ा कर फूलों कोमुन्ना है लगा तोड़ने जबतब माँ ने उसको समझायाइनको है छूना तुम मतबड़े परिश्रम से यह पौधेबढ़ते और पनपते हैंलगे हुए डाली पर हीयह अच्छे सुन्दर लगते हैंमुन्ना तब माँ से बोलामैं इनमें पानी डालूँगासुन्दर सुरभित पुष्प वाटिकामित्रों को…See More
Aug 5
Usha Awasthi posted blog posts
Aug 5
Mohammed Arif commented on Usha Awasthi's blog post प्राचीन गुरुकुल
"आदरणीया उषा अवस्थी जी आदाब,                               प्राचीन गुरूकुल शिक्षा प्राप्ति के स्थल को रेखांकित.करती अच्छी कविता । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।"
Aug 5
Kishorekant left a comment for Usha Awasthi
"सुन्दर रचना केलिये हार्दिक अभिनंदन सुश्री उषा अवस्थिजी ।"
Aug 5
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post प्राचीन गुरुकुल
"आदाब, बहुत-बहुत शुक्रिया।"
Aug 4
Samar kabeer commented on Usha Awasthi's blog post प्राचीन गुरुकुल
"मुहतरमा ऊषा अवस्थी जी आदाब,बहुत अच्छी रचना हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
Aug 4
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post जरा धीरे चलो
"आभार रक्षिता जी।"
Jun 15
Rakshita Singh commented on Usha Awasthi's blog post जरा धीरे चलो
"आदरणीया ऊषा जी, नमस्कार बहुत सुन्दर पंक्तियाँ ....हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।"
Jun 15
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post जरा धीरे चलो
"आभार महेन्द्र जी।"
Jun 13

Profile Information

Gender
Female
City State
Lucknow
Native Place
Uttar Pradesh
Profession
Author

Usha Awasthi's Blog

आधुनिक शिक्षा संस्थान

शिक्षा संस्थाओं के
हाल आज और हैं
छात्र यूनियनों में
लड़ाई  के दौर हैं

शिक्षालय आज 
राजनीति के अड्डे हैं
कमाई,चुनाव के
थ॓धों पर थंधे हैं

फैली अराजकता
अलग -अलग झंडे हैं
परिसर में घूमते
दलालों के पंडे हैं


मौलिक एवं अप्रकाशित

Posted on August 4, 2018 at 10:30am

प्राचीन गुरुकुल

पूर्णतया शिक्षा को गुरू समर्पित थे

कंद,मूल,फल,बिना जोता अन्न खाते थे

पठन -पाठन को समय बचाते थे

तभी तो गुरुजन श्रृषि कहलाते थे



गुरुकुल के प्राँगण में व्यर्थ वाद वर्जित था

गुरू ज्ञान-धारा से हर छात्र सिंचित था

चरणों में उनके नतमस्तक हो जाते थे

तभी तो गुरुजन श्रृषि कहलाते थे



राजा उनसे मिलने गुरुगृह जब जाते थे

आयुध अपने बाहर रख अन्दर आते थे

उलझनें शासन की,उन स॔ग सुलझाते थे

तभी तो गुरुजन श्रृषि कहलाते थे



मौलिक एव॔…

Continue

Posted on August 4, 2018 at 10:30am — 8 Comments

जरा धीरे चलो

जिन्दगी थोड़ा ठहर जाओ
जरा धीरे चलो
तेज इस रफ्तार से 
घात से प्रतिघात से 
वक्त रहते , सम्भल जाओ
जरा धीरे चलो
जिन्दगी - - - -
कामना के ज्वार में
मान के अधिभार में
डूबने से बच , उबर जाओ
जरा धीरे चलो
जिन्दगी - - - -
शब्दाडम्बरों के
उत्तरों प्रत्युत्तरों के
जाल से बच कर , निकल जाओ 
जरा धीरे चलो
जिन्दगी - - - -

(मौलिक एवम अप्रकाशित)

Posted on June 12, 2018 at 10:27pm — 11 Comments

कितने रोगों से बच जाते

जब कागज के ये रुपये

सुन्दर सिक्कों में ढल जाते

तब सचमुच अच्छा होता

कितने रोगों से बच जाते



कम से कम गंदे नोटों को

हमें नहीं छूना पड़ता

जिनमें गुटखा पीक लगा हो

और हिसाब लिखा चुभता



तभी पुराने महाराजे

सुन्दर सिक्के गढ़वाते थे

जो भी हो , गंदे सिक्के

पानी  से तो धुल जाते थे

सिक्कों की प्राचीन प्रथा

सचमुच में कितनी अच्छी थी

स्वस्थ रहे जनता अपनी

यह सुभग भावना सच्ची…

Continue

Posted on May 21, 2018 at 7:30pm — 2 Comments

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At 6:29am on August 5, 2018, Kishorekant said…

सुन्दर रचना केलिये हार्दिक अभिनंदन सुश्री उषा अवस्थिजी ।

At 9:01pm on September 9, 2017,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए....

 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

भारतीय छंद विधान से सम्बंधित जानकारी  यहाँ उपलब्ध है.

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