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upasna siag
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Profile Information

Gender
Female
City State
abohar punjab
Native Place
abohar
Profession
house wife

Upasna siag's Blog

एक कली मुस्काई ...

सोनाली हर बार यानि पिछले आठ वर्षों से अपना जन्म -दिन , घर के पास के पार्क में खेलने वालों बच्चों के साथ ही मनाती है। उनके लिए बहुत सारी  चोकलेट खरीद कर उनमे बाँट देती है।आज भी वह पार्क की और ही जा रही है।उसे देखते ही बच्चे दौड़ कर  पास आ गए।और वह ...! जितने बच्चे उसकी बाँहों में आ सकते थे , भर लिया। फिर खड़ी हो कर  चोकलेट का डिब्बा खोला और सब के आगे कर दिया।बच्चे जन्म-दिन की बधाई देते हुए चोकलेट लेकर खाने लगे।

 " एक बच्चा इधर भी है ,  उसे भी चोकलेट मिलेगी क्या ...?" सोनाली के पीछे से…

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Posted on July 1, 2015 at 5:30pm — 9 Comments

स्कूटर पर जाती महिला

स्कूटर पर जाती महिला

का सड़क से गुज़रना  हो

या  गुज़रना हो

काँटों भरी संकड़ी गली से ,

दोनों ही बातें

एक जैसी ही तो है।

लालबत्ती पर रुके स्कूटर पर

बैठी महिला के

स्कूटर के ब्रांड को नहीं देखता

कोई भी ...

देखा जाता है तो

महिला का फिगर

ऊपर से नीचे तक

और बरसा  दिए जाते हैं फिर

अश्लील नज़रों के जहरीले कांटे ..

काँटों की  गली से गुजरना

इतना मुश्किल नहीं है

जितना…

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Posted on December 20, 2013 at 9:00pm — 12 Comments

क्यूंकि तुम प्रेम हो और प्रेम मैं भी हूँ .......

मैं प्रेम हूँ 

तुम भी तो प्रेम ही हो 

प्रेम से हट कर 

क्या नाम दूँ 

तुम्हें भी और मुझे भी ...

कितनी सदियों से 

और जन्मो से भी 

हम साथ है 

जुड़े हुए एक-दूसरे के 

प्रेम में 

हर जन्म में तुमसे 

मिलना हुआ 

लेकिन मिल के भी मेल 

ना हो सका 

प्रेम फिर भी रहा 

तुम में और मुझ में भी 

चलते जा रहें है 

समानांतर रेखाओं की तरह 

साथ हो कर भी साथ…

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Posted on February 28, 2013 at 3:30pm — 17 Comments

बदलती नज़रें ...( लघु कथा )

उर्वशी की बाहर पुकार हो रही थी। वह  शीशे  के आगे खड़ी अपना चेहरा संवारती -निहारती कुछ सोच में थी। तभी फिर से उर्वशीईइ .....! नाम की पुकार ने उसे चौंका दिया।

उर्वशी उसका असली नाम तो नहीं था पर क्या नाम था उसका असल में , वह भी नहीं जानती !

अप्सराओं की तरह बेहद सुंदर रूप ने उसका नाम उर्वशी रखवा दिया और भूख -गरीबी और मजबूरी ने उसे स्टेज -डांसर बना दिया। वह छोटे - बड़े समारोह या विवाह समारोह में डांस कर के परिवार का भरण -पोषण करती है अब , आज-कल।

गन्दी , कामुक , लपलपाती नज़रों के…

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Posted on February 12, 2013 at 5:24pm — 19 Comments

Comment Wall (3 comments)

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At 11:49pm on February 22, 2013, बृजेश नीरज said…

आपने मुझे मित्रता योग्य समझा इसके लिए आपका आभार!

At 7:35pm on January 24, 2013, sanjiv verma 'salil' said…

उपासबा जी
आपकी दोनों रचनाएँ पढ़ीं. आप की भाव प्रवणता, शब्द चयन और बिम्बादि उज्जवल भविष्य के प्रति आशान्वित करते हैं. बधाई.

At 3:23pm on January 19, 2013, Dr Dilip Mittal said…

शुक्रिया ,

 
 
 

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