For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

June 2012 Blog Posts

राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- १९

(आज से उन्नीस वर्ष पूर्व लिखी रचना)

मुझे प्यार की सज़ा दो.......

 

तुमसे बगैर पूछे मैंने

तुम्हें सोचा है कई बार

कभी शाम की लम्बी सड़क पे

तन्हा टहलते समनज़ारों तक

कभी रात की सियाह खामोशी में

चहलकदमी करते घर के चौबारे पर

कभी कमरे के रौज़न से

दूर बाहर खलाओं में देखते हुए

कभी शहर की भीड़-भाड़ सड़कों में

दफतर से लौटते हुए

यूँ ही कभी

कुछ करते, कुछ न करते हुए

सोचा है कई बार…

Continue

Added by राज़ नवादवी on June 29, 2012 at 4:04pm — No Comments

राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- १८

(आज से उन्नीस वर्ष पूर्व लिखी रचना)

अपनी हताशा से फिर इक बार उठूँगा....

 

मैं मानता हूँ,

तुम्हारी उपेक्षा का प्रहार सह न सका

और गिर गया निराशा की कठोर धरा पे

अपनी व्यथा का भार लिए!

 

मैं मानता हूँ

मेरी पीड़ाका अतिस्राव

अभी और भी दुखायेगा मुझे

जब तुमसे बह कर आने वाली हवा

स्मृतियों का एक पूरा संसार

छोड जाएगी पीछे!

 

मैं मानता हूँ

अभी और भी जलेंगे

मेरी…

Continue

Added by राज़ नवादवी on June 29, 2012 at 3:59pm — No Comments

राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- १७

(आज से अट्ठारह वर्ष पूर्व लिखी रचना)

सूखे फूल खिल उठेंगे.......

 

सूखे फूल जो फिर खिल उठेंगे पेड़ों पे

क्षीण आशाएँ जो पुन: जाग जाएँगी हृदय में

भूले रास्ते

जो फिर से आ मिलेंगे मेरी असीम यात्रा पथों से

बिछड़े लोग, छूट गये घर, पुरानी किताबें

जिनसे फिर होगा समागम

जीवन के किसी अकल्पित क्षण में.........

मैं जी रहा हूँ उसी फूल

उन्हीं आशाओं

उन्हीं रास्तों

उन्हीं लोग

उन्हीं घर और किताबों…

Continue

Added by राज़ नवादवी on June 29, 2012 at 3:54pm — No Comments

राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- १६

(आज से अट्ठारह वर्ष पूर्व लिखी रचना)

एक तुम्हारे खत ने....

 

नदी के वे द्वीप

जो दिशांतर में लुप्त नहीं हुए अभी

संबंधों के निष्कर्ष

जो लिखे नहीं गये अब तक

वे लोग जो अभी

आधे-अधूरे हैं विश्वासों की परिधि में

वे आहटें

जिनके सोते से जागने का भय

आशंकाओं ने संभाल रखा है अब तक

दूरियों के गहराये भँवर

जिनमें अभी शेष नहीं हुआ है सब कुछ

आशा-निराशा की वीथि

सोते जागते के सपने

सच…

Continue

Added by राज़ नवादवी on June 29, 2012 at 3:48pm — No Comments

राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- १५

(आज से अट्ठारह वर्ष पूर्व लिखी रचना)

किंचित इतना है....

 

इतिहास के भुला दिये जाने वाले चरित्रों की तरह

अपने जीवन की कामना नहीं की है मैंने,

न ही देश और काल की सत्ताओं में लक्षित

अपने सुख दुख के व्यापारों का इष्ट ही

मेरे जीवन का ध्येय है,

मैं यह भी नहीं सोचता कि समय से परे

स्मरणीय लोगों में एक

मेरा जीवन चरित भी उल्लेख्य हो,

मैं अकिंचन हूँ

या अजस्र संभावनाओं का पुंज

इन गहन विवेचनों का…

Continue

Added by राज़ नवादवी on June 29, 2012 at 3:42pm — No Comments

राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- १४

(आज से अट्ठारह वर्ष पूर्व लिखी रचना)

प्रणय.....

 

जिन संस्कारों ने

जीवन के  साहसिक निर्णयों से वंचित रखा अब तक/

जिन इच्छाओं की काल्पनिक प्रतिबद्धताओं ने

वंचना और अवंचना के  द्वंद्वों में

सीमायित रखा मुझे/

जो अनाख्यायित जिजीविषा

हर प्रवृति, हर लिप्तता में निभृत रही

और जिनसे उद्भास न हो सका सच का/

जिन मोहों को लेकर जीता रहा

उनका अभिशाप/

जो –दृष्टि नित्यानित्य के  विवेक से…

Continue

Added by राज़ नवादवी on June 29, 2012 at 3:36pm — No Comments

राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- १३

(आज से अट्ठारह वर्ष पूर्व लिखी रचना)

क्या होता.....

 

यदि मैं अनेक सम्पन्नताओं से युक्त भी होता

तो क्या होता

मेरे जीवन में यदि धनाभाव न होता

और स्पृह लोगों की वन्चना न होती

यदि प्रतिदिन की उलझनें ना होतीं संताप देने को

और सब कुछ सुलभ और सुगम भी होता

तब भी जीवन का उतकर्ष अपरिहार्य  था....

अपने अस्तित्व से जुड़े भव्य कथानकों का

मेरे पश्चात मूल्य भी क्या होता

इसके अतिरिक्त कि

समीक्षाओं और…

Continue

Added by राज़ नवादवी on June 29, 2012 at 3:03pm — No Comments

राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- १२

(आज से उन्नीस वर्ष पूर्व लिखी रचना)

हताशा...

 

हर जन्म में

अपने सीमित प्रत्यक्षों से छले जाने के बाद भी

सत्य की अन्येतर संप्रभुता को नकारता रहा हूँ

ये जानते हुए भी कि

संबन्धों का सत्व विषाद से अतिरंजित है

जीवन के विषयीगत समीकरणों में

अनुबध्द होने की चेष्टा करता रहा हूँ

और अनादि काल से

प्रेम के जिस सम्पूरक आधेय की तलाश रही है

उसे वायव्य पिन्डों के सदृश

कभी प्राप्त नहीं कर सका…

Continue

Added by राज़ नवादवी on June 29, 2012 at 3:00pm — No Comments

राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- ११

(आज से अट्ठारह वर्ष पूर्व लिखी रचना)

बैचलर.....

 

मेरे घर भी मनुहारों का खेल होता

मेरे पत्नी होती, मेरे बच्चे होते

कभी बच्चों की किलक, कभी माँ की छीज

घर गृहस्थी के सामानों के अभाव का

कभी होता अनुभव

समय से खाने और

समय से घर लौटने के बंधनों का बोध

कभी यूँ ही छुट्टी के रोज़

देर तक अकर्मण्य बने रहने का सुख होता

और होता

पत्नी की शिकायत और

बच्चों के प्रतिवेदनों में गुम्फित

एक…

Continue

Added by राज़ नवादवी on June 29, 2012 at 2:55pm — No Comments

राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- १०

(आज से सत्रह वर्ष पूर्व लिखी रचना)

वे दिन फिर आयेंगे.....

 

अनखिली कलियों के वैभव भी

सृजित होंगे कभी किन्हीं जन्मों में

अनकहे शब्दों के अर्थ

और अनसुनी बातों के अभिप्रेय भी

अनिभृत होंगे हमारे मन में

पनप रही मृदुल आशाओं के उत्कर्ष भी

विदित होंगे जीवन में..

 

जो सानिध्य अधूरा है

और जो सामीप्य अप्राप्य

वे भी नहीं रहेंगे सदैव ऐसे

इन अपरिचित देशों में....

 

पौष की काली…

Continue

Added by राज़ नवादवी on June 29, 2012 at 2:51pm — No Comments

राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- ९

(आज से सत्रह वर्ष पूर्व लिखी रचना)

आरोप....

 

तुम्हारी मृदा में उपजे हैं

ये शूल मेरे स्वार्थ के

तुम्हारी हवाओं ने रूक्ष किया है

मेरे अकिन्चन स्पेशों को

तुम्हारे प्रसंगों की कठोरताओं ने

मेरी संरचना को भार दिया

मेरे उच्चारों के प्रपंच

तुम्हारी छलनाओं से ही निगमित हुए हैं.

 

परिवर्तन की जिस प्रक्रिया ने मुझे

तुमसे एकरूपता दी है

जीवन का जो क्रम

और मूल्यों के जो अर्थ

अब…

Continue

Added by राज़ नवादवी on June 29, 2012 at 2:47pm — No Comments

राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- ८

(आज से अट्ठारह वर्ष पूर्व लिखी रचना)

मैं सोचता था.......

 

मैं सोचता था-

वे दीये बुझ चुके हैं

जिनसे रौशनी नहीं आती

 

जिनके दरवाज़े बन्द हो चुके हैं

और खिड़कियाँ नहीं खुलीं बरसों से

उन घरों में कोई नहीं रहता

जो गीत होटों पे खेले नहीं मुद्दत से

और जिन सुरों का आलाप किया नहीं सालों से

वे सर्फ हो गये न दीखने वाले

वक्त के बियावानों में

 

मैं सोचता था-

वे दीये बुझ चुके…

Continue

Added by राज़ नवादवी on June 29, 2012 at 2:41pm — No Comments

राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- ७

(आज से उन्नीस वर्ष पूर्व लिखी रचना)

कब तक...

 

स्वप्न की इस दीर्घ निशा में

कब तक यूँही

अपनी अभीप्साजनित कल्पनाओं के

निराकार सत्त्व को

तुम्हारा नाम देता रहूँ

 

कब तक कहता रहूँ

अपने विषण्ण मन को

व्यग्र आग्रहों की निविड़ प्राची से

जब तुम्हारे नयन

अनिमेष देखेंगे मुझे

व्यथा भार से क्लांत

कांतिविहीन

तब रक्तांशुक किरणें बन

तुम्हारी स्निग्ध दृष्टि का…

Continue

Added by राज़ नवादवी on June 29, 2012 at 2:36pm — No Comments

राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- ६

(आज से उन्नीस वर्ष पूर्व लिखी रचना)

तुम्हें भूल सकता हूँ .......

 

मैं सोचता तो हूँ

परिस्थितियों से हार जाऊँ,

तुम्हें भूलजाऊँ;

 

मैं चाहता तो हूँ

तनावों के असंपादित अध्यायों से

दूर निकल जाऊँ,

कहीं एक शब्द, एक वाक्य बनकर

इस निस्सीम व्योम में

किन्हीं वायव्य माध्यमों से उच्चरित होकर

अपनी अस्मिता की समिधा जलाऊँ;

 

मैं चाहता तो हूँ

कि क्रिया-अनुक्रिया…

Continue

Added by राज़ नवादवी on June 29, 2012 at 2:32pm — No Comments

राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- ५

(आज से उन्नीस वर्ष पूर्व लिखी रचना)

प्रेम का वक्तव्य...

 

प्रेम का वक्तव्य छुपाते-छुपाते

मैंने अपनी आँखों में

अनुभूतियों का जो मौन

लिख डाला है

मुझे भय है वो

किसी निर्मेघ आकाश सा

अनिभृत न हो जाए तुमपे

और यदि खोकर भी

उस मौन आमंत्रण का

अस्फुट संवाद

मैं तुम्हारी स्निग्ध दृष्टि का

एक सलज्ज उन्मेष भी न पा सकूँ

तो फिर से

प्रेम की वंचना का बोझ

किस प्रकार ढो…

Continue

Added by राज़ नवादवी on June 29, 2012 at 2:18pm — No Comments

राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- ४

(आज से उन्नीस वर्ष पूर्व लिखी रचना)

शून्य से आपादित जीवन में.....

 

अनुभूतियों की शिराओं में

तुम्हारे प्रेम की आँच अब भी  शेष है

और

संवेदनाओं की धमनियाँ अब भी

तुम्हारे आकर्षण का आस्वाद

अहर्निश ढोती हैं

 

जीवन की विषमताओं का गरलपान करते हुए

तुम्हारी अनेकश: उपेक्षाओं का प्रहार सहते हुए

मन के कोने में

प्रेम का जो इक दीप जला रक्खा है

उसने सदैव

संध्यानुगामी, क्लान्त, विषण्ण…

Continue

Added by राज़ नवादवी on June 29, 2012 at 2:14pm — No Comments

राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- ३

(आज से उन्नीस वर्ष पूर्व लिखी रचना)

एक घर मेरा भी  होगा......

 

सोचा था

चाँद की उपत्यका में

एक घर मेरा भी  होगा

जहाँ और न होंगे इस धरा के तनाव

जहाँ और न होगा

मानवी संबंधों का छुपाव

जहाँ शब्द

समय के परिप्रेक्ष्य में न देखे जाएँगे

जहाँ निरभ्र आकाश सा होगा

निरायाम, अतल जीवन

संवेदनाओं की उर्मियों में जहाँ

कोई न होगा अन्येतर बल

हाँ , बस होगा…

Continue

Added by राज़ नवादवी on June 29, 2012 at 1:34pm — No Comments

राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- २

(आज से बारह वर्ष पूर्व लिखी रचना)

तुम्हारे नाम की कविता...

 

शब्दों के टूटते बिखरते झरने में बह जायेंगे

मेरे प्यार के अनकहे बोल,

नहीं रोक पाऊँगा अब और

जो मैंने लिखी थी इन अबाध धाराओं में

तुम्हारे नाम की इक कविता।

 

समय तो अविरल है

अनन्तताओं में बहता रहता है

यह हृदय नहीं जो कभी कुछ कहता है

और कभी / यूँ ही ख़ामोश रहा करता है

कदाचित् , एक शाश्वत गीत है यह समय

जिसे हर…

Continue

Added by राज़ नवादवी on June 29, 2012 at 1:28pm — No Comments

राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- १

(आज से बारह वर्ष पूर्व लिखी रचना)

काव्य भी एक प्रसव है...

 

काव्य भी एक प्रसव है

जिसकी पीड़ाओं से ही जन्म लेते हैं मेरे गीत ।

 

शब्दों में गूँथकर, और भावनाओं में पिरोकर

काग़ज़ पे जिन्हें उतारता हूँ

वो गीत,

तुम्हारे ही श्रृंगारित प्रणय की स्मृतियों से उदभूत हुए हैं

तुम्हारी ही अथक कल्पनाओं ने

कायिक आयाम दिया है उन गीतों को

जो गीत प्राणों से उठकर

और मेरी आँखों में लहराकर

मेरे…

Continue

Added by राज़ नवादवी on June 29, 2012 at 1:22pm — No Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
"डोरी बंधन की........"

ये कैसी डोरी बंधन की,  है जैसे कच्चे रेशम की..
डर लगता है टूट न जाए, साथ कहीं ये छूट न जाए..
 
इस से मन के तार जुड़े हैं, सपनों के संसार जुड़े हैं..
सप्त सुरों में इसकी लय है, हर सावन इस की ही शय है..
 
गुँथे …
Continue

Added by Dr.Prachi Singh on June 29, 2012 at 11:46am — 4 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Ashok Kumar Raktale commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"चुप रहिए...  वाह  क्या रदीफ़ है, इसे देखकर ही मैं हाज़िर हो गया.  रहना हो भारत में…"
yesterday
Ashok Kumar Raktale commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"अभिनय करते मंच पर, माटी के किरदार ।जीवन की अनुभूतियाँ, करते वो साकार ।।.....सच है अभिनय जीवन की…"
yesterday
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

बरसात

बरसात घन गरजे अंधियारी छाई,बिजली अम्बर पर इठलाई  बूँदें टपकी टप-टप भाईरिमझिम रिमझिम बारिश आई पत्ते…See More
Sunday
vijay nikore replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"Dear respected Admin team: A few minutes ago, I typed my suggestion, but lost it all before it was…"
Saturday
vijay nikore replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"..."
Saturday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"  आदरणीय,  तकनीकी दृष्टिकोण से मैं कुछ  अधिक नहीं कह सकता । किन्तु यदि हमारा …"
Jun 14

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"सभी विद्वद्जन अपने-अपने हिसाब कुछ न कुछ चर्चा कर रहे हैं, उपाय बता रहे हैं, आदरणीय ..  आप भी…"
Jun 12
Chetan Prakash replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
" आदरणीय सौरभ साहब,  अंततोगत्वा कुछ ऐसा प्रबंध तो होना ही चाहिए कि ओ,बी,ओ पराभव को प्राप्त…"
Jun 12
जगदानन्द झा 'मनु' added a discussion to the group मैथिली साहित्य
Thumbnail

भक्ति गजल

सजल कन्हाइ रूपक रस बहाबैएहरिक ई रूप दुनियाकेँ रिझाबैएमुकुटपर पैंख मोरक मोहनी सोहैहियामे रस सिनेहक ई…See More
Jun 11

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"  उत्साहित बने रहने और सतत चलते रहने के सुझाव से निस्सृत होती सकारात्मकता का आयाम आश्वस्तिकारी…"
Jun 8
धर्मेन्द्र कुमार सिंह replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"जब कविता कोश चल सकता है तो ओबीओ क्यूँ नहीं। वहाँ भी शुरू में जो लोग थे आज नहीं हैं। नए-नए लोग…"
Jun 6

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"चर्चा में आपकी उपस्थिति तथा आपके भावमय शब्दों का स्वागत है आदरणीय मिथिलेश जी. "
Jun 6

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service