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July 2022 Blog Posts

मैं जताना जानता तो

मैं जताना जानता तो बन बैरागी यूं ना फिरता 

मेरे ही ख़िलाफ़ ना होता आज ये उसूल मेरा 

मैं ठहरना जानता तो बन के यूं भंवरा ना फिरता 

मेरे पग को बांध लेता फिर कोई अरमान मेरा 

 

मैं बताना जानता तो दाग़ लेकर यूं ना…

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Added by AMAN SINHA on July 6, 2022 at 11:40am — No Comments

शब्द - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

दोहे

****

मुख सा सम्मुख और के, रखिए शब्द सँवार

सुन्दर  शब्दों  के  बिना, कहते  लोग  गँवार।१।

*

युद्ध शब्द  से  जन्मते, और  शब्द से शान्ति

महिमा अद्भुत शब्द की, जिससे होती क्रांति।२।

*

कोई शब्दों में भरे, अद्भुत सहज मिठास I

कोई रीता रख उन्हें, देता अनबुझ प्यास।३।

*

कोई सज्जन कह  गया, बात  बड़ी गम्भीर।

जीवन घायल मत करो, शब्दों को कर तीर।४।

*

कोई छाया दे  सदा, कर शब्दों को पेड़।

कोई शब्दों से यहाँ , बखिया देत…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 6, 2022 at 5:30am — No Comments

कालिख दिलों के साथ में ठूँसी दिमाग में - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२२१/२१२१/१२२१/२१२

*

पथ में कोई सँभालने वाला नहीं हुआ

ये पाँव जानते थे जो छाला नहीं हुआ।।

*

कैसा तमस ये साँझ ने आगोश में भरा

इतने जले चराग उजाला नहीं हुआ।।

*

कालिख दिलों के साथ में ठूँसी दिमाग में

ऐसे ही मुख ये आप का काला नहीं हुआ।।

*

नेता ने क्या क्या पेट में ठूँसा है देश का

बस आदमी ही उसका निवाला नहीं हुआ।।

*

कोशिश बहुत की वैसे तो बँटवारे बाद भी

यह घर किसी भी राह शिवाला नहीं हुआ।।

*

मौलिक/अप्रकाशित

लक्ष्मण धामी…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 5, 2022 at 2:19pm — 3 Comments

दोहा मुक्तक .....

दोहा  मुक्तक ........

कड़- कड़ कड़के दामिनी, घन बरसे घनघोर ।

   उत्पातों  के  दौर  में, साँस का  मचाए  शोर  ।

        रात   बढ़ी  बढ़ते   गए,  आलिंगन   के   बंध -

           पागल दिल को भा गया , दिल का प्यारा चोर ।

                       * * * * *

एक दिवानी को हुआ, दीवाने  से  प्यार ।

     पलकों में सजने लगा, सपनों का संसार ।

           गुपचुप-गुपचुप फिर हुए, नैनों में संकेत  -

                चरम पलों में हो  गए, शर्मीले  अभिसार…

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Added by Sushil Sarna on July 4, 2022 at 9:38pm — 2 Comments

भोर सुख की निर्धनों ने पर कहीं देखी नहीं -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर'

२१२२/२१२२/२१२२/२१२

*

जब कोई दीवानगी  ही  आप ने पाली नहीं

जान लो ये जिन्दगी भी जिन्दगी सोची नहीं।।

*

पात टूटे  दूब  सूखी   ठूठ  जैसे  हैं  विटप

शेष धरती का कहीं भी रंग अब धानी नहीं।।

*

भर रहे हैं सब हवा में आग जब देखो सनम

फूल होगा याद  में  बस  गन्ध  तो होगी नहीं।।

*

तैरती है प्यास आँखों में सभी के रक्त की

हो गये हैं  लोग  दानव  पी  रहे पानी नहीं।।

*

राजशाही  साम्यवादी  लोकशाही  दौर  सब

भोर सुख की निर्धनों ने पर कहीं देखी…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 4, 2022 at 7:22pm — 2 Comments

गजल

212  212  212  22 

इक वहम सी लगे वो भरी सी जेब 

साथ रहती मेरे अब फटी सी जेब 

ख्वाब देखे सदा सुनहरे दिन के 

आँख खुलते मिली बस कटी सी जेब 

चैन आराम सब खो दिया तुमने 

पास…

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Added by gumnaam pithoragarhi on July 4, 2022 at 9:30am — 6 Comments

सब एक

सब एक



उषा अवस्थी



सत्य में स्थित



कौन किसे हाराएगा?

कौन किससे हारेगा?

जो तुम, वह हम

सब एक



ज्ञानी वही अज्ञानी भी वही…

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Added by Usha Awasthi on July 3, 2022 at 6:56pm — No Comments

होना जहाँ को आज भी साकेत चाहिए-लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२२१/२१२१/१२२१/२१२

*

पानी  नहीं  नदी  से  जिन्हें  रेत चाहिए

रचने को सेज अन्न का हर खेत चाहिए।२।

*

औषध नहीं पहाड़ से पत्थर खदान कर

कंक्रीट के नगर  को  वो समवेत चाहिए।२।

*

दो पल के सुख दे छीनले पूरी सदी को जो

सब को विकास  नाम  का  वो प्रेत चाहिए।३।

*

छाया से पेड़ की नहीं लकड़ी से प्यार है

कुर्सी को जंगलों  की  सभी बेत चाहिए।४।

*

धरती को नोच चाँद को रौंदा उन्हें यहाँ

रीती  नदी  में  नीर  का  संकेत चाहिए।५।

*

वैभव नगर का साथ में…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 3, 2022 at 6:40am — No Comments

कहतें हैं वोट शक्ति का पर्याय है अगर -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२२१/२१२१/१२२१/२१२

*

अब  झूठ  राजनीति  में  दस्तूर  हो गया

जिस का हुआ विरोध वो मशहूर हो गया।१।

*

जनता के हक में बोलते जो काम बोझ है

नेता के हक में  काम  वो  मन्जूर हो गया।२।

*

कहते हो वोट  शक्ति  का पर्याय है अगर

क्यों लोक आज देश का मजबूर हो गया।३।

*

जो चाहे मोल दे  के  करा लेता काम है

कानून  जैसे  देश का  मजदूर  हो गया।४।

*

जनता न राजनीति की मन्जिल बनी कभी

उपयोग उस  का  राह  सा  भरपूर हो गया।५।

*

होता भला न…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 2, 2022 at 3:30am — 2 Comments

सत्य

सत्य

उषा अवस्थी

असत्य को धार देकर

बढ़ाने का ख़ुमार हो गया है

स्वस्थ परिचर्चा को 

ग़लत दिशा देना

लोगों की आदत में 

शुमार हो गया है।

 

असत्य के महल खड़े कर

खिल्ली मत उड़ाओ

अनेकानेक झूठ को

सत्य से,धूल चटाओ

शास्त्र वाक्यों को दोराकर

अभिमान मत जताओ

कर्म में परिणित करो

व्यर्थ मत,समय गँवाओ

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Usha Awasthi on July 1, 2022 at 7:05pm — 2 Comments

किराए का मकान

दीवारें हैं छत हैं

संगमरमर का फर्श भी

फिर भी ये मकान अपना घर नहीं लगता

चुकाता हूँ

मैं इसका दाम, हर तारीख पहली…

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Added by AMAN SINHA on July 1, 2022 at 11:30am — No Comments

कभी तो पढ़ेगा वो संसार घर हैं - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

१२२/१२२/१२२/१२२

*

सियासत को आता है तलवार पढ़ना

उसे भी सिखाओ तनिक प्यार पढ़ना।।

*

किसी दिन सभी कुछ यहाँ फूक देगा

सिखाओ न अब तुम ये अंगार पढ़ना।।

*

वही झूठ हर  दिन  वही  दुख भरा है

सुखद कब लगेगा ये अखबार पढ़ना।।

*

शिखर खोजते है बहुत लोग लेकिन

किसी को न भाता है  आधार पढ़ना।।

*

कभी  तो  पढ़ेगा  वो  संसार  घर हैं

जिसे आ गया घर को संसार पढ़ना।।

*

जमाने को अच्छा अगर कर न पाये

समझ लो हुआ सबका बेकार…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 1, 2022 at 2:53am — 9 Comments

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