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Naveen Mani Tripathi's Blog – March 2017 Archive (5)

पनघट भी ज़हरीला होगा

22 22 22 22



चाँद बहुत शर्मीला होगा ।

थोड़ा रंग रगीला होगा ।।



यादों में क्यों नींद उडी है।

कोई छैल छबीला होगा ।।



रेतों पर जो शब्द लिखे थे ।

डूब गया वह टीला होगा ।।



ख़ास अदा पर मिटने वालों ।

पथ आगे पथरीला होगा ।।



जिसने हुस्न बचाकर रक्खा ।

हाथ उसी का पीला होगा ।।



ज़ख़्मी जाने कितने दिल हैं ।

ख़ंजर बहुत नुकीला होगा ।।



मत उसको मासूम् समझना ।

दिलवर बहुत हठीला होगा ।।



बिछड़ेंगे जीवन के… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on March 27, 2017 at 6:51pm — 1 Comment

ख़त उसका भी आता होगा

22 22 22 22

मुद्दत से वह ठहरा होगा ।

रिश्ता शायद दिल का होगा ।।



सच कहना था गैर ज़रूरी ।

छुप छुप कर वह रोता होगा ।।



ढूढ़ रहा है तुझको आशिक।

नाम गली में पूछा होगा ।।



इल्म कहाँ था इतना उसको ।

अपना गाँव पराया होगा ।।



चेहरा देगा साफ़ गवाही।

जैसा वक्त बिताया होगा ।।



दाग मिलेगा गौर से देखो ।

चिलमन अगर उठाया होगा ।।



मैंने उसको याद किया है ।

खत उसका भी आता होगा ।।



यूँ ही कब निकले हैं आँसू… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on March 27, 2017 at 2:37pm — 9 Comments

ग़ज़ल

221 1222 221 1222



इक जख़्म पुराना था फिर जख़्म नया दोगे ।

मासूम मुहब्बत है कुछ दाग लगा दोगे ।।



कमजर्फ जमाने में जीना है बहुत मुश्किल ।

है खूब पता मुझको दो पल में भुला दोगे ।।



एहसान करोगे क्या बेदर्द तेरी फ़ितरत ।

बदले में किसी भी दिन पर्दे को उठा दोगे ।।



कैसे वो यकीं कर ले तुम लौट के आओगे ।

इक आग बुझाने में इक आग लगा दोगे ।।



आदत है पुरानी ये गैरों पे करम करना ।

अपनों की तमन्ना पर अफ़सोस जता दोगे ।।



मजबून… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on March 19, 2017 at 5:23pm — 7 Comments

ग़ज़ल: कैसे कह दूँ मैं अलविदा तुझसे

2122 1212 22

कैसे कह दूँ मैं अलविदा तुझसे ।

चैन आया है हर दफ़ा तुझसे ।।



इक सुलगती हुई सी खामोसी ।

इक फ़साना लिखा मिला तुझसे ।।



वो इशारा था आँख का तेरे ।

दिल था पागल छला गया तुझसे ।।



भूल जाती मेरा तसव्वुर भी ।

क्यूँ हुई रात भर दुआ तुझसे ।।



बेखुदी में जो इश्क कर बैठा ।

उम्र भर बस वही जला तुझसे ।।



कर लूँ कैसे यकीन वादों पर ।

कोई वादा कहाँ निभा तुझसे ।।



कुछ रक़ीबों से गुफ्तगूं करके ।

तीर वाज़िब…

Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on March 7, 2017 at 11:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल अब्रे जहराब से बरसा है ये कैसा पानी

वज़्न - 2122 1122 1122 22/112



अब्रे जहराब से बरसा है ये कैसा पानी ।

भर गया मुल्क की आँखों में हया का पानी ।।



मिट ही जाए न कहीं शाख जे एन यू की अब ।

आइये साफ़ करें मिल के ये गन्दा पानी।।



मन्नतें उन की हैं हो जाएं वतन के टुकड़े ।

सर के ऊपर से निकल जाए न खारा पानी ।।



कुछ हैं जयचन्द सुख़नवर जो खुशामद में लगे ।

बेच बैठे हैं जो इमानो कलम का पानी ।।



आलिमों का है ये तालीम ख़ता कौन कहे ।

ख़ास साजिश के तहत हद से गुजारा पानी… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on March 6, 2017 at 10:30pm — 8 Comments

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