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Aazi Tamaam's Blog – April 2021 Archive (10)

नग़मा: जगाकर दिल में उम्मीदें दिलों को तोड़ने वालो

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जगाकर दिल में उम्मीदें दिलों को तोड़ने वालो

हमारा क्या है हम तो बेसहारा हैं सो जी लेंगे

तुम्हारा दिल अगर टूटा तो फ़िर तुम जी न पाओगे

मिरे लख़्त-ए-जिगर सुन लो गमों को पी न पाओगे

जरा सा नर्म रक्खो इस गुमाँ के सख़्त लहजे को

ये चादर फट गयी गर ज़िंदगी की सी न पाओगे

यहाँ हर शय पे रहता है मिरी जाँ वक़्त का पहरा

अगर जो वक़्त बदला तो बचा हस्ती न पाओगे

हमें आदत है पीने की सो हम तो…

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Added by Aazi Tamaam on April 30, 2021 at 11:22am — No Comments

नज़्म: किंदील

जलता है जिस्म सुर्ख है किंदील के जैसे

इक झील दिन में लगती है किंदील के जैसे

हर शाम उतर आता है ये दरियाओं झीलों पर

मर फ़ासलाई होगी इक खगोलिये इकाई

दिखता भी सुर्ख सुर्ख है घामें लपेटे है

सूरज भी तो जलता है इक किंदील के जैसे

है तीरगी घनी घनी ज़हनों के अंदर तक

सब भूल जायें जात-पात हद-कद और सरहद

सब ख़ाक करके बंदिशें रौशन करें ख़ुद को

मैं भी जलू तू भी जले किंदील के जैसे

चलो मिलके सारे जलते हैं किंदील के जैसे

है धरती के…

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Added by Aazi Tamaam on April 28, 2021 at 10:59am — No Comments

गीतिका छंद: रास्ते सुनसान और घर, कैद खाने हो गये

14-12

रास्ते सुनसान और घर, कैद खाने हो गये

खुशनुमा इंसान दहशत, के निशाने हो गये

बेबसी का हाल देखा, दिल दहल कर रह गया

मुफ़्लिसी में ज़िंदगी का, ख़्वाब जल कर रह गया

डर से कोरोना के भी, वो भला अब क्या डरे…

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Added by Aazi Tamaam on April 24, 2021 at 11:30pm — 2 Comments

ग़ज़ल: कफ़स में उम्र गुजरी है परिंदा उड़ न पायेगा

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कफ़स में उम्र गुजरी है परिंदा उड़ न पायेगा

जो तुम आज़ाद भी कर दो घर अपने मुड़ न पायेगा

संभल जाना अगर कोई तुम्हें करने ख़ुदा आये

वगरना ऐसे तोड़ेगा कि दिल फ़िर जुड़ न पायेगा

वो चाहे बेड़ियों से हो या फ़िर की हो किसी दिल से

अगर जो पड़ गई आदत तो बंधन छुड़ न पायेगा

लुटेरे हैं ये सब मुफ़्लिस जो तुम विश्वास दिलाते हो

रिवायत बन गया गर ये भरम फ़िर तुड़ न पायेगा

तमाम आज़ी कुछ आदत…

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Added by Aazi Tamaam on April 24, 2021 at 10:40am — No Comments

नग़मा: इक रोज़ लहू जम जायेगा इक रोज़ क़लम थम जायेगी

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इक रोज़ लहू जम जायेगा इक रोज़ क़लम थम जायेगी

ना दिल से सियाही निकलेगी ना सांस मुझे लिख पायेगी

जिस रोज़ नये लब गाएंगे जिस रोज़ मैं चुप हो जाऊंगा

इक चाँद फ़लक से उतरेगा इक रूह फ़लक तक जायेगी

फिर नये नये अफ़सानों में कुछ नये नये चहरे होंगे

फिर नये नये किरदारों के किरदार नये गहरे होंगे

फिर कोई पिरोयेगा रिश्तों को नये नये अल्फाज़ों में

फिर कोई पुरानी रश्मों को ढालेगा नये रिवाज़ों…

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Added by Aazi Tamaam on April 11, 2021 at 8:00pm — 7 Comments

नज़्म: मटर

ज़िंदगी भी मटर के जैसी है 

तह खोलो बिखरने लगती है

कितने दाने महफूज़ रहते हैं उन फलियों की आगोशी में

कुछ टेढ़े से कुछ बुचके से कुछ फुले से कुछ पिचके से

हू ब हू रिश्तों के जैसे लगते हैं

कुनबे से परिवारों से कुछ सगे या रिश्तेदारों से

पर सभी आज़ाद होना चाहते हैं कैद से

रिवायतों से बंदिशों से बागवाँ से साजिशों से

ज़िंदगी भी मटर के जैसी है

तह खोलो बिखरने लगती है

(मौलिक व अप्रकाशित) 

आज़ी तमाम

Added by Aazi Tamaam on April 8, 2021 at 2:00pm — 4 Comments

नज़्म: ख़्वाहिश

कोई ख़्वाब न होता आँखों में 

कोई हूक न उठती सीने में

कितनी आसानी होती 

या रब तन्हा जीने में

दिल जब से टूटा चाहत में

रिंद बने पैमानों के

ढलते ढलते ढल गई

सारी उम्र गुजर गई पीने में

यूँ ही सांसें लेते रहना

यूँ ही जीते रहना बस

हर दिन साल के जैसा 'गुजरा

हर इक साल महीने में

दुनिया डूबी लहरों में

हम डूबे यार सफ़ीने में

देखीं कैसी कैसी बातें

अज़ब ग़ज़ब दुनियादारी

वो कितने ना पाक…

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Added by Aazi Tamaam on April 8, 2021 at 11:30am — 2 Comments

ग़ज़ल: जैसे जैसे ही ग़ज़ल रुदाद ए कहानी पड़ेगी

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जैसे जैसे ही ग़ज़ल रूदाद ए कहानी पड़ेगी

वैसे वैसे ही सनम दिल की फज़ा धानी पड़ेगी

रश्म हर दिल को महब्बत में ये उठानी पड़ेगी

दिल जलाकर भी कसम दिल से ही निभानी पड़ेगी

ख़ुश न होकर भी ख़ुशी दिल में है दिखानी पड़ेगी

कुछ न कहकर भी रज़ा दिल की यूँ सुनानी पड़ेगी

हुस्न वालो की सुनो ना ख़ुद पे भी इतना इतराओ

लम्हा दर लम्हा महंगी तुम्हें न'दानी…

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Added by Aazi Tamaam on April 7, 2021 at 3:00pm — 4 Comments

ग़ज़ल: माँ

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मुझको तेरी आवाज़ से खुशबू आती है

तेरे हर इक अल्फाज़ से खुशबू आती है

आँचल से जैसे इत्र सा झरता रहता है…

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Added by Aazi Tamaam on April 7, 2021 at 8:00am — 4 Comments

ग़ज़ल: रोयेंगे और मुस्कुरायेंगे

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रोयेंगे और मुस्कुरायेंगे

उम्र भर तुम को गुनगुनायेंगे

तुम जो रहते हो बादलों में सनम

तुम को हम कैसे भूल पायेंगे

जब भी देखेंगे आसमानों को

दिल के अरमाँ मचल ही जायेंगे

ग़म की आँधी न रोक पायेंगे

अश्क आँखों से बहते जायेंगे

कैसे रोकेंगे हसरतें दिल की

चीख कर तुम को फ़िर बुलायेंगे

जी न पायेंगे मर न पायेंगे

दिल जलायेंगे…

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Added by Aazi Tamaam on April 5, 2021 at 11:00am — No Comments

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